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[1] हिन्दू मन्दिरो को तोड़कर उनपर मस्जिदों का निर्माण कराया
[1] हिन्दू मन्दिरो को तोड़कर उनपर मस्जिदों का निर्माण कराया
[2] औरंगजेब और शिवाजी
[3] औरंगजेब और गुरु गोबिंद
[4] औरंगजेब और गुरु तेग बहादुर
[5] सिख और मुसलमानों के बीच में कड़वाहट
[6] जिज़या
इधर उधर की उड़ी उड़ाई बातों पर विश्वास कर के हम लोगों ने औरंगजेब आलमगीर को मन्दिरो को तोड़ने वाला, हिंदूओ पर ज़ुल्म ढाने वाला, गैर मुस्लिमों को तलवार के बल पर मुसलमान बनने पे मजबूर करने वाला, खूखार, बेदर्द और न जाने क्या क्या समझ रखा है
ये सब मानने से पहले काश हम एक बार औरन्गज़ेब आलमगीर से भी जानने की कोशिश करते कि वो गैर मुस्लिमों के विषय मे क्या विचार रखते थे,
आइए आज बादशाह की ज़बानी ही जानें
अपने बनारस के सूबेदार के नाम एक ख़त में औरंगज़ेब
आलमगीर ने लिखा था “अपनी हिन्दू रिआया के साथ ज़ुल्म
न करना। उनके साथ धार्मिक उदारता बरतना और
उनकी धार्मिक भावनाओं का लिहाज़ करना।"
औरंगज़ेब आलमगीर इन्सान इन्सान के बीच फ़र्क को
अल्लाह की नज़रों में गुनाह समझते थे। उनके पिता
शाहजहाँ जब तख़्त पर थे तो एक बार उन्होने औरंगज़ेब
आलमगीर से शिकायत की कि औरन्गज़ेब को शहज़ादा होने की हैसियत
से छोटे बड़े सब से एक तरह नहीं मिलना चाहिये।
इस पर औरंगज़ेब
आलमगीर ने अपने बाप की हर तरह इज्ज़त करते हुये जवाब दिया था – “लोगों के साथ मेरा बराबरी का
बर्ताव इस्लाम के सिद्धांतो के बिलकुल अनुरूप है। इस्लाम के पैग़म्बर ने
कभी अपनी ज़िन्दगी में छोटे बड़े की तमीज़ नहीं की। ख़ुदा की नज़रों में सब इंसान बराबर हैं।
इसलिये मैं आपका हुक्म मानने में अपने को असमर्थ पाता हूँ।”
ये था वो बादशाह जो न हिंदू मुसलमान मे फर्क करता था और न अमीर और गरीब मे
ये था वो बादशाह जिसके बनवाए अनेक मन्दिर आज भी चीख चीख के उसकी धर्मनिरपेक्षता की गवाही दे रहे हैं, बस हमें एक बार अपनी आंखो से पूर्वाग्रह और व्यर्थ की नफरत का परदा हटाकर देखने की आवश्यकता है
पुस्तक का नाम: भारतीय संस्कृति और मुग़ल साम्राज्य
• लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय
( उड़ीसा के भूतपूर्व राज्यपाल, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवम् इतिहासकार )
• प्रकाशन: हिंदी अकादमी, दिल्ली 1993
इतिहासकारो ने औरन्गजेब द्वारा कट्टर मुस्लिम की छवि अपनाने को धर्म से नही बल्कि राजनीति से प्रेरित माना है, क्योंकि उन्होने मुगल बादशाह के चरित्र मे बहुत विरोधाभास पाए. कभी औरन्गजेब हिन्दुओ पर सख्त दिखे तो कभी नर्म
बादशाह द्वारा लागू की गई कानून व्यवस्था के बारे मे हम पढ़े तो पाते हैं कि
औरंगज़ेब ने अपने राज्य मे भांग की खेती पर रोक लगा दी थी, साथ ही अपने राज्य मे सार्वजनिक रूप से शराब पीने और जुआ खेलने पे रोक लगा दी थी ।
शासन की बागडोर सम्हालने के बाद मुगल बादशाह ने जिज़्या नामक कर हिंदू जनता पर लगा दिया इस बात का बड़ा (कु)प्रचार किया जाता है.
लेकिन इस तथ्य को बिल्कुल छुपा लिया जाता है कि उसी बादशाह ने अपनी जनता पर से कुल 80 कर हटा लिये थे जिनमें तीर्थ यात्रा कर जैसे धर्म आधारित कर भी थे जिन्हें बादशाह औरंगज़ेब ने जनता पर से हटा लिया था ॥
मेरे विचार मे बादशाह ने सबसे ज्यादा पुनीत कार्य किया अपने राज्य मे सती प्रथा को बंद करवा कर, इन तमाम कुप्रथाओ के साथ ही बादशाह ने वेश्यावृत्ति भी बंद करवाई और दास व्यापार भी बंद करवाया
अब चाहे किसी को ये शासनादेश किसी की धार्मिक स्वतन्त्रता का हनन लगते हों, लेकिन मै इसे मानवाधिकार की जीत समझता हूँ, जो दमित और शोषित वर्ग को औरंगज़ेब के शासन मे ही प्राप्त हुए
औरंगज़ेब ने पूरे मुगल युग मे सबसे ज्यादा हिन्दुओं को मनसबदारी प्रदान की थी और अपने दरबार मे सर्वाधिक 33% हिन्दू मनसबदारो को स्थान दिया था , खुद सोचिए अगर औरन्गजेब के मन मे हिन्दुओ से किसी प्रकार का बैर होता तो वो हिन्दुओ को इतने उच्च पद क्यो प्रदान करते??
इतिहास के ये सारे तथ्य आप डाक्टर लईक अहमद की लिखी किताब " मुगल कालीन भारत", पेज : 177-178
और हरिश्चन्द्र वर्मा की लिखी किताब "मध्य कालीन भारत", पेज : 147 मे पढ़ सकते हैं
अगर इतिहास पर बात करनी हो तो किसी साफदिल इतिहासकार की स्टडी देखिये खासकर मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के बारे में इतिहासकार बिशम्भर नाथ पांडे यानि बी एन पांडेय जी की स्टडी देखनी चाहिये कि उन्होंने क्या पाया है
बी एन पांडेय साहब कोई छोटे मोटे शख़्स नही थे बल्कि उनका परिचय बहुत बड़ा है, और उनके परिचय के बड़ा होने की वजह से उनकी बात भी बहुत वज़नदार साबित होती है
बिशम्भर नाथ पाण्डेय जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे
ये भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सदस्य थे, और प्रसिद्ध गाँधीवादी थे, ये कई वर्षों तक गांधी स्मृति एवं दर्शन स्मृति के चेयरपर्सन रहे और विश्व के कई देशों में इन्हें गांधीवाद पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया
बी एन पाण्डेय जी उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे, इलाहबाद के मेयर के पद पर रहे, वर्ष 1980 से 1983 तक प्रदेश काँग्रेस कमेटी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे, वर्ष 1984 से 1988 तक ओडिसा के गवर्नर के पद पर रहे, तथा वर्ष 1976 से 1984 तक और 1989 से 1998 तक यानि मृत्युपर्यन्त राज्यसभा के सदस्य रहे इन्हें इनकी अभूतपूर्व सेवाओं के लिये वर्ष 1976 में पद्म श्री से अलंकृत किया गया था
बी एन पांडेय जी ने अपना सारा जीवन राष्ट्रीय एकता के लिए प्रयासरत होकर गुज़ारा. बी एन पाण्डेय जी को समाज सेवा के कार्यों और उनके ऐतिहासिक शोधों के लिये भी जाना जाता है इलाहबाद में मेयर के पद पर (1948-1953) कार्य करते हुए मुग़ल बादशाह औरंगजेब (1618-1707) का एक मंदिर को ज़मीन दान करने संबंधी फ़रमान इनके सामने आया
इन फरमानों को देखकर बी एन पाण्डेय जी को बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि ये फरमान औरंगज़ेब की हिन्दू विरोधी छवि के बिलकुल विपरीत थे. उन्होंने इस विषय का गहराई से अध्ययन करने का निश्चय किया और अपने सहयोगी तुर्की फ़ारसी भाषा के विद्वान सर तेज बहादुर सप्रू की सलाह पर भारत के विभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतों के पास पत्र भेज कर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगजेब के कुछ फरमान हो जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गर्इ हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कॉपियां भेज दें,
अब उनके सामने एक और आश्चर्य की बात आर्इ, उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जार्इ के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मंदिरों एवं गुरूद्वारो से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगजेब के फरमानों की नकले उन्हें प्राप्त हुर्इ। ये फरमान 1065 हि0 से 1091 हि0 अर्थात 1659 से 1685 र्इस्वी के बीच जारी किए गए थे यानि बादशाह औरंगजेब के राज्यारोहण के आरंभिक वर्ष से उत्तरार्ध के वर्षों तक . जिनसे साबित हुआ कि औरंगज़ेब पर अंग्रेजों ने हिन्दू दुश्मनी के झूठे आरोप लगाये थे
[1] हिन्दू मन्दिरो को तोड़कर उनपर मस्जिदों का निर्माण कराया
अक्सर कुछ लोग, मुगल बादशाहो और उनमें भी विशेषकर औरंगज़ेब के ऊपर ये आरोप लगाते हैं कि उन्होंने हिन्दू मन्दिरो को तोड़कर उनपर मस्जिदों का निर्माण कराया
आइए देखें कि इस विषय मे इस्लामी कानून क्या कहता है
इस्लाम के नियम के अनुसार मस्जिद को इबादत करने के लिए न बनाकर किसी अन्य गलत कार्य को करने के उद्देश्य से बनाने, जिस मस्जिद को बनाने में अल्लाह को खुश करने की नीयत न हो या अपवित्र धन से मस्जिद बनाने की सख्त मनाही है
इतिहास मे दर्ज है कि यदि किसी मुस्लिम ने अज्ञानतावश ऐसी मस्जिद बनाई तो उसे स्वयं मुस्लिम खलीफा ने ही तुड़वा दिया
अल्लाह के रसूल ﷺ के जीवनकाल में इस्लाम के कुछ दुश्मन इस्लाम को नुकसान पहुंचाने के लिये एक दुर्योजना के तहत ऊपरी तौर से मुसलमान हो गये थे, लेकिन वास्तव में वे मुसलमान नहीं थे। ऐसे लोगों को इस्लाम ने मुनाफिक कहा है। इन मुनाफिकों ने इस्लाम के विरूद्ध षड्यन्त्र करने और अपनी संगोष्ठी के लिये मदीना में एक अलग मस्जिद का निर्माण कराया था। इस मस्जिद का नाम ‘जिरार’ था,
नबी ﷺ के संज्ञान मे जब ये मामला आया तो आप ﷺ ने उस मस्जिद को गिरा देने का आदेश दिया
मुस्लिम उलमा व फुकहा (इस्लामी धर्म विधान के ज्ञाता) की राय में कुरान व हदीस के अनुसार किसी भी अवैध कब्जे वाली भूमि पर मस्जिद बनाना जायज नहीं है चाहे वो जमीन किसी मुस्लिम समुदाय से सम्बन्धित लोगों की हो या गैर मुस्लिमों की।
इस्लामी इतिहास में जिक्र है कि उमवी खलीफा वलीद बिन अब्दुल मलिक ने ईसाईयों से जबरन यूहन्ना गिरजाघर लेकर उसे मस्जिद में शामिल कर लिया। कुछ वर्षों बाद जब हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज (रह0) खलीफा बनाये गये, तो ईसाईयों ने उनसे इस मामले में शिकायत की। खलीफा ने तुरन्त अपने गवर्नर को लिखा कि मस्जिद का वह हिस्सा ईसाईयों को वापस कर दिया जाये, ताकि वे उस मस्जिद को तोड़कर वापस वहाँ चर्च बना सकें परंतु खलीफा के न्याय से संतुष्ट होकर बाद मे ईसाईयों ने मुस्लिमों से ये समझौता कर लिया कि वे हर्जाना लेकर नई जगह चर्च बना लेंगे
इसी प्रकार का एक वृतान्त ये है कि, मिस्र की एक गैर मुसलिम बुढ़िया ने खलीफा हजरत उमर रज़ि. से शिकायत की आप के गवर्नर अबुल आस ने मेरी आज्ञा के बगैर मेरा मकान गिराकर मस्जिद मे सम्मिलित कर लिया हैं गवर्नर बुलाए गए। उन्होने इस बात को स्वीकार किया कि शिकायत सही हैं। मस्जिद तंग पड़ती है और किसी और तरफ बढ़ने की गुंजाइश नही थी . इस पर खलीफा ने आदेश दिया की मस्जिद तोड़कर बुढ़िया को उसकी जमीन वापिस दे दी जाए
तो देखिए, इस्लामी कानून मे स्पष्ट आदेश है कि जबरदस्ती कब्जा कर के बनाई गई मस्जिद अवैध होती है, और ढहा दी जाने की अधिकारी होती है
फिर चाहे वो मस्जिद किसी अन्य धर्म के धार्मिक महत्व वाले महत्वपूर्ण स्थान पर बनाई गई हो या अन्याय से किसी के साधारण घर तक पर बनाई गई हो, इस्लामी कानून को कोई भी अन्यायपूर्ण ढंग से बनाई गई मस्जिद मन्जूर नहीं
तो फिर एक इस्लामी विद्वान होने के नाते औरंगज़ेब से ये अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि ऐसी मस्जिद बनाकर वो पाप के भागी बनें जिसे इस्लामी कानून के अनुसार गिरा देना चाहिए .l ऐसी अपेक्षा किसी ऐसे बादशाह से तो की जा सकती है जिसे इस्लाम का ज्ञान न्यून हो, लेकिन औरंगज़ेब से नही . बल्कि औरंगज़ेब तो खुद ऐसी मस्जिदों को ढहा देते थे ( देखें बी.एन.पाण्डेय की किताब "इतिहास के साथ ये अन्याय" मे औरन्गजेब द्वारा गोलकुण्डा की जामा मस्जिद गिराए जाने का मामला )
औरंगज़ेब ने कुछ मन्दिरो को भी गिराने के आदेश अवश्य दिए थे, लेकिन उसके पीछे किसी प्रकार का धार्मिक द्वेष नही था .बल्कि जिन मन्दिरो मे बैठकर विद्रोही सत्ता के विरुद्ध षणयन्त्र रचा करते थे या जिन मन्दिरो के अन्दर से विद्रोही युद्ध का मोर्चा सम्हाला करते थे औरन्गजेब ने मस्जिदे जिरार के नियम के तहत उन मन्दिरो को गिराने के आदेश दिए थे. परंतु बाद मे उन मन्दिरो के अवशेषो पर औरंगज़ेब द्वारा मस्जिदों के निर्माण का कयास लगाना, न सिर्फ मूर्खतापूर्ण है बल्कि पूरी तरह इस्लाम के विरुद्ध भी है
प्रमाण बताते हैं कि जिन मन्दिरो को औरंगज़ेब ने गिरवाया, बाद मे उन मन्दिरो का पुनर्निर्माण भी स्वयं औरंगज़ेब ने ही करवा दिया था
चित्र सन्दर्भ : भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2 / पृ. 234
इसी कारण जब औरन्गजेब के तुरंत बाद मथुरा आदि पर जाट अधिपत्य हुआ तो जाटो ने किसी मस्जिद को गिराने या किसी मन्दिर का पुनर्निर्माण करने की आवश्यकता महसूस नही की, क्योंकि उन्होंने देखा था कि कोई मस्जिद किसी मन्दिर पर बनी ही नही थी और सारे मन्दिरो का का पुनर्निर्माण मुगल बादशाह द्वारा ही करा दिया गया था ॥
ये सम्भवतः मुगल बादशाह औरंगजेब का बनवाया हुआ विश्वनाथ मंदिर है
.
हमें इतिहास में पढ़ाया गया था कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान कई हिन्दू मंदिरों का अस्तित्व मिटा डाला था, इसमें काशी का प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर भी था, जिसको औरंगज़ेब ने हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए तुड़वा दिया था, बाद में जब बनारस पर अंग्रेज़ों का शासन हुआ तब मराठा महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में एक नए विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया.
वहीँ दूसरी ओर इतिहास को लेकर एक और दावा भी था.
औरंगज़ेब द्वारा जारी किए गए प्राचीन फरमानों के आधार पर डाक्टर पट्टाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "द फेदर्स एण्ड द स्टोन्स" मे दावा किया था कि विश्वनाथ मंदिर को बादशाह औरंगजेब ने अपवित्र स्थान से अन्यत्र पुनर्निर्मित करवा दिया था. परन्तु अब तक ये दावा इसलिये कमज़ोर लगता था क्योंकि औरंगज़ेब द्वारा बनवाया गया कोई विश्वनाथ मंदिर बनारस में नही बताया जाता था, विश्वनाथ मंदिर के नाम पर केवल महारानी होल्कर का बनवाया मंदिर ही नज़रों के सामने था
प्रश्न ये था कि "मूल भगवान" यानि प्राचीन विश्वनाथ शिवलिंग जिस मंदिर में स्थापित करने की बात जो दस्तावेज़ों में है, वो मंदिर अगर औरंगज़ेब द्वारा बनवाया गया था तो वो कहाँ है ? उस मंदिर के न मिलने पर ये प्रतीत हो सकता था कि औरंगज़ेब का नाहक ही बचाव पट्टाभि सीतारमैय्या और बी एन पांडेय जैसे विद्वानों ने किया है, पर सम्भवतः अब औरंगज़ेब द्वारा बनवाया गया विश्वनाथ मंदिर मिल गया है, इसे छिपा कर रखा गया था, ताकि देश की अमूल्य धरोहर पर केवल एक ही व्यक्ति का कब्ज़ा बना रह सके,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में प्रस्तावित विश्वनाथ कॉरिडोर के लिये भवनों के ध्वस्तीकरण का कार्य चल रहा है। इस दौरान कई प्राचीन मंदिरों को गिराये जाने के कारण विवाद की स्थिति भी सामने आ रही है.l
लेकिन दूसरी ओर बात करें रिहाइशी मकानों की, तो इन मकानों के ध्वस्तीकरण से तो सबसे ज्यादा चौंका देने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं।
ध्वस्तीकरण में घरों से प्राचीन मंदिर मिल रहे हैं, इन मंदिरों का अस्तित्व इन पर कब्ज़ा करने वालों ने दुनिया से छिपा कर रखा था, इन मंदिरों में मूर्तियां, शिवलिंग आदि बाकायदा स्थापित हैं, मंदिरों की पहचान मिटाने या छिपाने के प्रयास नही किये गए जिससे पता चलता है कि इन मंदिरों पर कब्ज़ा "आस्थावान" लोगों का ही था,
नवम्बर 2018 में हुए ध्वस्तीकरण में एक मकान में मिले मंदिर को देख कर लोग हैरान हो गए, ये मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के जैसा ही दिखता है, काशी विश्वनाथ मंदिर जैसी ही वास्तुकला से निर्मित किया गया है, पर इसमें नंदी और शिवलिंग का आकार काशी विश्वनाथ मंदिर के नंदी और शिवलिंग से बड़ा है और मंदिर में नीचे की ओर रथ बना हुआ है। मंदिर के खंभों पर कीचक भी बने हुए हैं, एक ही शक्ल का ये दूसरा अज्ञात मंदिर कैसा ?
हो न हो ये वही विश्वनाथ मंदिर है जिसको औरंगज़ेब ने मूल मंदिर की प्रतिकृति पर बनवाया था, इसी मंदिर में मूल शिवलिंग स्थापित किया गया था,
1780 में बनवाया गया मंदिर और आज मिले हमशक्ल मंदिर की डिजाइन बिलकुल एक सी हैं, लेकिन नन्दी और शिवलिंग के आकार इस अज्ञात मंदिर में बड़े हैं, जिस से ये प्रतीत होता है कि मराठा महारानी ने इस मंदिर की नकल पर दूसरा मंदिर बनवाया था परन्तु इस अज्ञात मंदिर के देवताओं की मूर्तियों को सम्मान देते हुए अपने मंदिर की मूर्तियों का आकार इनसे छोटा रखा. ज़ाहिर होता है कि 1780 के समय ये आज मिला मंदिर दुनिया के सामने था तभी बिलकुल इस जैसा दूसरा मंदिर बनवाया जा सका, महारानी होल्कर ने इस अज्ञात मंदिर की प्रतिकृति इसलिये बनवाई क्योंकि ये मंदिर था तो मूल विश्वनाथ मंदिर की शक्ल का, पर ये मूल स्थान से अलग स्थान पर बनाया गया था, इसी कारण मराठा महारानी ने इस मंदिर की ही शक्ल का एक मंदिर ज्ञानवापी के पास, उसे मंदिर का मूल स्थान मानते हुए बनवाया क्योंकि तब तक अँगरेज़ बनारस में आ चुके थे और डिवाइड एन्ड रूल का पत्ता फेंक चुके थे.
बाद के समय में कब इस मंदिर को दुनिया की नज़रों से छिपा लिया गया, और इस पर वैयक्तिक कब्ज़ा कर लिया गया, कब बहुत सारे अन्य मंदिरों को भी दुनिया की नज़रों से छिपा लिया गया, और कब उन गायब हो चुके मंदिरों को मुस्लिमों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया बताया जाने लगा, इन बातों पर अब केवल अनुमान ही लगाये जा सकते हैं, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि ये जो कुछ हुआ, इस सब में अलगाववाद की राजनीती करने वालों का फ़ायदा ज़रूर था
ध्वस्तीकरण में मिले जो अन्य मंदिर भी बने हुए हैं उनमें भी नायाब नक्काशी और वास्तुकला का उदाहरण देखने को मिलता है
भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण के नीरज सिन्हा ने बताया कि इन मंदिरों की प्राचीनता का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। कुछ मंदिरों को देखकर लग रहा है कि वो लगभग हजार साल पुराने हैं
बताते चलें कि प्रशासन ने 182 भवनों को खरीदकर उन्हे ध्वस्त करना शुरू किया था जिसमें से अब तक 40 मकानों को तोड़ा जा चुका है। इनमें से 43 छोटे-बड़े प्राचीन मंदिर मिले हैं.
सोचिये 40 मकानों में 43 बंधक मंदिर !!! कब्ज़ा किसी का और बदनामी मुस्लिम शासकों की... देखते जाइये अभी और कितने कब्ज़ों का पता चलता है ।।
अब देखिए जैसे ये एक और प्रमाण. जिसमें बादशाह ने मन्दिरो को तोड़े जाने से रोकने का आदेश दिया था , जबकि आम धारणा ये है कि औरन्ज़ेब को हिन्दू धर्म और मूर्ति पूजा से सख्त नफरत थी , और इस कारण अनेक हिंदू मन्दिरो को बादशाह के आदेश पर तोड़ दिया गया था , कुछ ऐतिहासिक तथ्यों का गलत अर्थ निकाल कर ये बात गढ़ ली गयी है कि औरन्गज़ेब इस्लाम का प्रसार करने के लिए गैर मुस्लिमों की हत्या तक कर डालने से परहेज़ नही करते थे .॥
लेकिन खुद सोचकर बताईए, क्या एक ऐसा इन्सान जो अपना धर्म फैलाने, और दूसरे धर्मों की नफरत मे इतना जुनूनी हो गया हो कि लोगों की हत्या कर डालने से भी गुरेज न करता हो, वो व्यक्ति दूसरे धर्मों के मन्दिरो आदि के निर्माण, रखरखाव और उन धर्म स्थलों की सुरक्षा के प्रति इतना सौहार्दपूर्ण व्यवहार अपना सकता है जिससे दूसरे धर्म फले फूले ? बिल्कुल नहीं न....!!!
दोस्तों, ध्यान रखिए कि इतिहास को लेकर कुछ अपुष्ट प्रमाणो के आधार पर रचे गए लोकप्रिय किस्से केवल तभी तक सच माने जा सकते हैं, जब तक इन किस्सो के विरुद्ध कोई ऐतिहासिक तथ्य, सबूत के रूप मे नही मिल जाता,
लेकिन जब इन अपुष्ट किस्सो के खिलाफ कोई पक्का सबूत मिल जाए, तो फिर इन किस्सो को तथ्य पर आधारित सत्य नही, बल्कि किसी प्रकार का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए सम्बन्धित पक्ष द्वारा गढ़ा गया झूठ माना जाएगा !!!
श्री राम पुनियानी प्रसिद्ध लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आईआईटी मुंबई के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर रह चुके श्री पुनियानी ने 2004 में स्वैच्छिक अवकाश लिया ।
इन्होने देश और समाज मे धर्मनिरपेक्षता, और सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए बड़े ही सराहनीय प्रयास किए हैं ।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (2006), राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव पुरस्कार (2007) प्राप्त कर चुके पुनियानी ने अपनी गहन अध्ययन के पश्चात कई किताबें लिखी है। जिनमे "कम्युनलिज्म : व्हाट इज फॉल्स , व्हाट इज ट्रू" , "कम्युनल पॉलिटिक्स : फैक्ट्स वर्सेज मिथ्स" , "टेररिज्म : फैक्ट्स वर्सेज मिथ्स" आदि प्रमुख हैं ।
अपनी किताब "कम्युनल पॉलिटिक्स : फैक्ट्स वर्सेज मिथ्स" मे वे लिखते हैं
ये एक मिथ है कि भारत के सभी मुस्लिम शासकों मे से औरंगजेब सबसे अधिक धर्मान्ध और हिंदू विरोधी शासक थे
कट्टरतावादी मुस्लिम इतिहासकारो ने भी लिखा है कि औरंगजेब का लक्ष्य पूरे भारत मे इस्लाम का प्रसार कर के भारत को दार उल हरब से दार उल इस्लाम बनाना था ।
परंतु सत्य ये है कि औरंगज़ेब ने लगभग 50 वर्ष तक भारत पर राज किया, इस लम्बी अवधि मे उन्होंने अपनी नीतियों मे हालात के अनुसार परिवर्तन किए , उन का प्रमुख लक्ष्य था अपने राज्य का अधिक से अधिक विस्तार करना ।
तथ्य ये है कि औरंगजेब के शासन के उत्तरार्ध मे, दरबार मे हिंदू अधिकारियो की संख्या पिछले सभी मुस्लिम शासकों के दरबार की अपेक्षा सर्वाधिक, यानी 33% थी, इतने अधिक हिंदू अधिकारी पहले कभी किसी मुस्लिम शासक के दरबार मे नहीं रहे थे
ये तथ्य औरंगजेब से जुड़े हिंदू विरोध के सभी मिथो का खण्डन करता है ।"
" ये ठीक है कि औरंगजेब ने नवीन मन्दिरो के निर्माण पर रोक लगाई, लेकिन प्राचीन मन्दिरो के जीर्णोद्धार और रखरखाव की अनुमति उन्होंने दे रखी थी
गैर मुस्लिम जनता का प्रेम पाने के लिए औरन्गज़ेब ने अनेक मन्दिरो को उदारतापूर्वक जागीरे प्रदान कीं
मन्दिरो को जागीरे देने के अनेक फरमान प्रसिद्ध इतिहासकार श्री पाण्डेय ने संकलित किए हैं, इन मे उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमान उल्लेखनीय हैं ।"
"औरंगज़ेब के शासनकाल मे अधिकांश समय ब्राह्मणो, बूढ़े लोगों और निर्धनो को छोड़ कर बाकी गैर मुस्लिम जनता पर जिज़्या लागू रहा परंतु इस बात मे कोई दम नहीं कि इन पैसों का उपयोग इस्लाम के प्रसार मे किया जाता था ।
दक्कन मे अकाल के समय औरंगजेब ने जिज़्या माफ भी कर दिया था
साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ज़कात नाम का धार्मिक कर मुस्लिमों पर भी पूरे मुस्लिम काल मे हमेशा ही लागू रहा ।"
[ कम्युनल पॉलिटिक्स : फैक्ट्स वर्सेज मिथ्स, पेज-60 ]
Aurangzeb ka wyavhar gair muslim janta ke prati kaisa tha, ye jaanne ke liye Aap bahot zyada ucch star ki itihas ki kitabe na bhi padhne jaayn to apne chhote bhai bahano ki NCRT Inter ki Itihas ki kitab he dekh len... NCERT ki 12th class ke liye kitab BHARTEEY ITIHAS KE KUCH VISHAY-2 me Bhatki Sufi Paramparayn Page: 149 pe likha hai
''shasako ne bhumi anudan aur kar ki Chhoot hindu, jain, parsi, isaai aur yahoodi dharm Sansthaao ko di sath he ghair muslim dharmik netaao ke prati shraddha bhav wyakt kiya ! aise anudaan anek mugal badshaho, jinme akbar aur Aurangzeb shamil thy dwara diye gaye''
Page 150 srot 6 me Aurangzeb dwara ek jogi ko likhe huye patr ka ansh dia hai ''Buland maQaam Shivmurat guru anand nath jiyo/ Janab e muhtaram, aman aur khushi se hamesha shri shiv jiyo ki panah me rahen. Poshak ke liye vastr aur 25 rupay ki raqam jo bhent ke taur par bheji gai aap tak pahochegi . janab e muhtaram aap hame likh sakte hain jab bhi hamari madad ki zarurat ho''
Page 234 ''Yuddh ke dauran agar mandir nasht ho jate thy to baad me unki marammat ke liye anudaan jaari kiye jate thy aisa hame Shahjahan aur Aurangzeb ke shasan kaal me pata chalta hai''
in facts se pata chal jata ki kattar muslim Badshah Aurangzeb ka kirdar kaisa tha !
क्या आप मुझे विश्वास दिला सकते हैं कि किसी दिन एल के आडवाणी , उमा भारती या तोगड़िया मे से कोई मुसलमानों के लिए एक भव्य मस्जिद बनवा के देंगे और उस मस्जिद के रखरखाव की जिम्मेदारी भी हमेशा के लिए खुद पर उठा लेंगे
नहीं न. इन लोगों से केवल मन्दिर बनवाने की अपेक्षा की जा सकती है, मस्जिद बनवाने की कभी नहीं, मस्जिद को तो केवल ये लोग तुड़वा ही सकते हैं. जैसा कि ये लोग पूर्व मे बाबरी मस्जिद के साथ कर भी चुके हैं. इन लोगों के बारे मे ये सोचा नहीं जा सकता कि ये दूसरे धर्म पर कभी ममता लुटा सकते हैं, क्योंकि इन लोगों की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेताओं की है
लेकिन इसे आप क्या कहेंगे कि गैर धर्म के लोगों पर ऐसी ही ममता उस बादशाह औरंगज़ेब ने लुटाई थी जिसे आज गैर मुस्लिमों से नफरत करने वाला, हज़ारों हिन्दुओं के जनेऊ काटकर जबरन उन्हें मुस्लिम बनाने वाला , कट्टर और ज़ालिम बादशाह बताया जाता है. और मजहबी उन्माद के कारण मन्दिर तोड़ने वाला मुगल बादशाह कहकर बदनाम किया जाता है
उसी बादशाह ने चित्रकूट में एक विशाल बालाजी का मंदिर बनवाया था
मंदिर में भोग प्रसाद के लिए औरंगजेब ने अपने खजाने से रोज एक रुपये की ब्यवस्था की थी और मंदिर के रखरखावके लिए ८ गाँवो की जमीं दान कर दी थी साथ ही एक ताम्रपत्र देकर अपने आदेश को न केवल गजट किया था वरन आने वाले शासको से भी उसकेआदेश को मानने की अपीलकी थी अंग्रेजी हुकूमत और अब सरकारें लगातार औरंगजेब के उस ताम्रपत्र पर मुहर लगाती चली आ रही है
मैंने बचपन से औरंगज़ेब को गैर मुस्लिमों से नफरत करने वाले एक जालिम बादशाह के ही रूप मे जाना था लेकिन अब से कुछ वर्ष पहले दूरदर्शन समाचार पर चित्रकूट के इस मन्दिर के बारे मे ये सुनकर कि ये मन्दिर बादशाह ने अपने एक हिन्दू सेनापति की सेवाओं से प्रसन्न होकर, उस सेनापति केे अनुरोध पर बनवाया था, और फिर औरंगज़ेब द्वारा मन्दिरो और साधुओं को कई प्रकार से सहायता देने के अनेकों फरमानों के बारे मे जानकर मुझे इतना विश्वास तो हो गया कि औरंगज़ेब के व्यक्तित्व के विषय मे हमें अपना विचार बदलना ही पड़ेगा, क्योंकि गैर धर्म से नफरत करने वाले उन्मादी लोग कभी गैर धर्म के मन्दिर नही बनवाते !!
[2] औरंगजेब और शिवाजी
बादशाह आलमगीर और शिवाजी के मध्य हुए युद्धो के विषय मे अलगाववादी ये प्रचारित किया करते रहते हैं कि शिवाजी ने "हिन्दू धर्म की रक्षार्थ" मुस्लिम आक्रान्ता बादशाह औरंगज़ेब से अनेक युद्ध किए , और उन युद्धों मे मुगल बादशाह को पराजित कर के शिवाजी ने औरन्गज़ेब का अनेक बार मान मर्दन किया और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रसार होने से रोका
परंतु इन अलगाववादी लोगों के हर झूठ से सभी शिक्षित लोग भली भांति परिचित हैं, वे जानते हैं कि शिवाजी को मुस्लिमों या इस्लाम से कोई दुश्मनी नही थी, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य ये है कि शिवाजी की सेना मे अनेक मुस्लिम शामिल थे और शिवाजी ने अपनी मुस्लिम जनता के लिए अपने राज्य मे मस्जिदों का निर्माण भी करवाया था, ठीक इसी प्रकार मुगल बादशाह औरन्गज़ेब की सेना मे भी अनेक हिन्दू सेनापति थे और औरंगज़ेब ने भी अपनी हिन्दू रियाया के लिए कई मन्दिर बनवाए,और उनकी भलाई के लिए अनेक काम किए !!
न ही बादशाह औरन्गज़ेब और शिवाजी के मध्य हुए युद्ध कोई धार्मिक युद्ध थे, वो युद्ध केवल और केवल साम्राज्य विस्तार के यानि एक राजनैतिक कारण से लड़े गए थे,
और ऐसे राजनैतिक युद्धो मे दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की व्यक्तिगत शत्रुता नहीं होती थी, बल्कि अक्सर समय पड़ने पर वही प्रतिपक्षी जिन्होंने पहले कभी एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध किया होता था, वे दोनों किसी तीसरे राज्य के खिलाफ युद्ध करने के लिए एक दूसरे से हाथ मिला कर मित्र बन जाया करते थे
ऐसी ही एक संधि औरन्गज़ेब आलमगीर और शिवाजी के मध्य भी हुई थी जो इतिहास मे "पुरन्दर की संधि" के नाम से विख्यात है
"शिवाजी और मुगल सेनापति जयसिंह के मध्य 11 जून 1665 ई0 मे पुरन्दर की विख्यात संधि हुई ! जिसके आधार पर शिवाजी 35 मे से 23 दुर्ग मुगलो को सौंपने को तत्पर हो गए, तथा 12 दुर्ग जागीर के रूप मे शिवाजी के पास रहे ! दूसरे, शिवाजी ने आश्वासन दिया कि यदि 5 लाख हूण वार्षिक राजस्व का बालाघाट एवं बीजापुर तथा 4 लाख हूण वार्षिक राजस्व का कोंकण का क्षेत्र शिवाजी को जागीर मे दिया जाता है तो शिवाजी 13 किस्तो मे बादशाह आलमगीर को 40 लाख हूण की राशि प्रदान करेंगे ! तीसरे, शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र को पांच हजारी मनसब प्रदान किया गया, और चौथे, शिवाजी ने औरन्गज़ेब को उनके शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक अभियानों मे पूर्ण सक्रिय सहयोग का आश्वासन दिया.
शिवाजी ने अपने वचनानुसार बीजापुर के विरुद्ध संघर्ष मे यथाशक्ति मुगलो की सहायता भी की !! "
मुगलकालीन भारत : डॉo लईक अहमद, पेज-272, संस्करण 2003
हालांकि ये संधि एक ही वर्ष कायम रही लेकिन इस संधि के लिए खुद पहल कर के शिवाजी ने जता दिया कि वे मुगल बादशाह से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं रखते .
1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार संधि की । औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी । शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया । पर, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुगलों का अधिपत्य बना रहा ।
अब कहिए कि औरन्गज़ेब और शिवाजी के बीच धर्म आधारित युद्ध हुए थे ?
ज़ाहिर है कि धार्मिक संकीर्णता शिवाजी या औरंगज़ेब मे नहीं थी, बल्कि संकीर्णता तो आज भारत की राजनीति मे कूट कूट कर भरी जा रही है, ताकि कुछ लोगों के राजनीतिक हित सध सकें .
"फूट डालो और राज करो" की नीति के तहत अंग्रेजो ने मुस्लिमों को हिन्दुओं और सिखों से लड़वाने के लिए भारत के मुस्लिम शासकों के विरुद्ध गैर मुस्लिमों पर अत्याचार की बहुत सी भड़काऊ बातें इतिहास मे लिखवाई हैं, प्राय: ये भड़काऊ बातें तथ्यों को गलत ढंग से पेश कर के लिखी गई हैं
[3] औरंगजेब और गुरु गोबिंद
अब जैसे औरंगजेब पर गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज से युद्ध कर के गुरु महाराज के साहिबजादों की हत्या करने, और गुरू महाराज के दो नन्हे साहिबजादों को दीवार मे चिनवा डालने के आरोप लगाए गए हैं !! कहा गया है कि औरंगज़ेब ने सभी गैर मुस्लिमों को काफिर मानकर उनसे नफरत करना, और उनको जबरन मुस्लिम बनाना अपना परम कर्तव्य समझ रखा था, इसी कारण औरंगज़ेब ने गुरु साहिबों की भी हत्या करवा डाली
औरंगजेब पर इतने गम्भीर आरोप निश्चय ही इस कारण लगाए गए क्योंकि औरंगजेब को इस्लाम का गहरा ज्ञान रखने और इस्लाम के नियमों पर जीवन बिताने के कारण जाना जाता है. इस कारण औरंगजेब द्वारा किए गए सारे "दुष्कृत्यों" बहुत आसानी से इस्लाम प्रेरित और इस्लामी शिक्षाओं के अनुकूल सिद्ध किया जा सकता था, इससे हिन्दुओं और सिखों के मन मे किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि पूरे इस्लाम धर्म से ही नफरत पैदा हो जाती.॥
अंग्रेजो ने केवल औरंगजेब से नफरत न दिलाकर उसके धर्म से सिखों और हिन्दुओं आदि को नफरत दिलाने की युक्ति इसलिए लगाई थी , क्योंकि यदि गुरु साहिबों की हत्या के आरोप केवल व्यक्तिगत रूप से औरंगजेब , और औरंगजेब के निजी राजनीतिक स्वार्थ पर लगाए जाते, तो लोगों को केवल औरंगजेब से दुश्मनी महसूस होती, और वो दुश्मनी औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही समाप्त भी हो जाती. लेकिन इन्हीं घटनाओं को औरन्गजेब द्वारा काफिरों के विरुद्ध इस्लामी जिहाद सिद्ध किए जाने के कारण दोनों समुदायों मे ऐसी फूट पड़ी जिसका नतीजा हमने 1947 मे बंटवारे के समय हुए खून खराबे मे देखा
बहरहाल .
औरंगज़ेब के फरमानो पर गहन शोध करने वाले प्रसिद्ध इतिहासविद् डॉ. बी एन पाण्डेय ने औरंगज़ेब के फरमानो और गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा बादशाह औरंगज़ेब को लिखे गए पत्र "ज़फरनामा" के आधार पर अपनी पुस्तक मे इस विषय मे जो लिखा उसका सारांश ये है कि औरंगज़ेब के राज्य के अधीन आने वाले हिंदू पहाड़ी राजाओं ने गुरु महाराज के "मन्सद" को मिलने वाली बहुमूल्य भेंटों के लालच मे मन्सद की हत्या कर दी. तब दरबार साहिब की सम्पत्ति वापस लेने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी की फौज ने पहाड़ी राजाओं पर हमला कर दिया, गुरु महाराज की फौज जब पहाड़ी राजाओं पर भारी पड़ी, तो इन राजाओं ने औरंगज़ेब को ये संदेश भिजवाया, कि गोबिन्द सिंह एक बागी है जिसने बादशाह की रियाया पर हमला कर दिया है,
अत: बादशाह उन्हें गोबिंद सिंह जी के विरुद्ध सैन्य सहायता भेजे
पर मन्त्रियों की सलाह पर बादशाह औरंगज़ेब ने गोबिंद सिंह जी की फौज के विरुद्ध अपनी ओर से फौज नहीं भेजी
पहाड़ी राजाओं के गुरु की फौज से युद्ध होते रहे , गोबिंद सिंह जी के आगे कमजोर पड़ रहे पहाड़ी राजाओं ने औरंगजेब को दोबारा लिखा कि यदि जहांपनाह हमें मदद नहीं देंगे तो गोबिंद सिंह सारा राज्य हड़प लेंगे और पंजाब के सबके सब हिंदू आपके हाथ से निकल जायेंगे.
इस बार औरंगज़ेब पहाड़ी राजाओं के धोखे मे आ गए और अपनी सत्ता और राज्य पर खतरा समझकर गुरु जी के विरुद्ध फौजी टुकड़ी भेज दी, यहाँ ये ध्यान देने की बात है कि औरंगज़ेब ने अपनी फौज किसी धार्मिक गुट के विरुद्ध किसी धर्म से दुश्मनी मानकर नहीं भेजी थी बल्कि अपने साम्राज्य पर से कब्जे का खतरा हटाने को भेजी थी
इसके बाद घमासान युद्ध हुआ जिसमें गुरु महाराज के दो साहिबजादे काम आए, एवं गोबिंद सिंह जी को भूमिगत होना पड़ा
माता गूजर कौर और गुरु महाराज के दो मासूम साहिबज़ादे गुरू जी के रसोइये गंगू (गंगा राम) के साथ थे परंतु ईनाम के लालच या जान के डर से गंगू ने माता और साहिबजादों को औरंगज़ेब के एक अधीनस्थ सरहिन्द के नवाब को सौंप दिया जिस मूर्ख नवाब ने औरंगज़ेब की जानकारी के बगैर मासूम बच्चों को दीवार मे चिनवा दिया, हालांकि मलेर कोटला के मुस्लिम नवाब ने उसे ऐसा करने से बहुत रोका, क्योंकि इस्लाम मे अवयस्क बच्चों की हत्या को एक जघन्य पाप बताया गया है.॥
लेकिन सरहिन्द का जाहिल नवाब न माना, और अनहोनी कर के रहा, किन्तु इतना तय है कि यदि माता गूजरी और साहिबजादों को औरंगज़ेब के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता तो औरंगज़ेब उन मासूम बच्चों की हत्या का आदेश तो बिल्कुल ही न देते ।
सन् 1705 मे बठिंडा के कांगड़ गाँव से गोबिंद सिंह जी ने औरंगज़ेब को फटकारते हुए एक पत्र लिखा , इसी ऐतिहासिक पत्र को आज 'ज़फरनामा' के नाम से जाना जाता है , इस पत्र में गुरु महाराज ने औरंगज़ेब से कहा कि तुझे शर्म नहीं आती कि तूने उन मूर्तीपूजकों को मुझ मूर्तीभंजक के विरुद्ध मदद दी.
पत्र को पढ़कर और गुरु महाराज का सारा पक्ष जानकर बादशाह औरंगज़ेब का मन ग्लानि और पछतावे से भर उठा कि अनजाने मे, पहाड़ी राजाओं के धोखे मे आकर बादशाह ने एक पुण्यात्मा को ऐसे कष्ट दे डाले.
औरंगज़ेब ने तुरंत ये फरमान जारी कराया कि गुरु गोविन्द सिंह जहां चाहे रहकर, जिस तरह चाहे ईश्वर को याद कर सकते हैं, और उनके साथ कहीं कोई दुर्व्यवहार न किया जाए, इसके साथ ही बादशाह औरंगज़ेब ने गुरु गोबिंद सिंह जी से मुलाकात करने की इच्छा व्यक्त की थी, सम्भवत: अपनी गलतियों का सुधार करने के लिए, लेकिन ऐसा हो पाता, इससे पहले ही औरंगज़ेब का देहान्त हो गया और अंग्रेजो को हमारे बीच फूट डालने का सुनहरा मौका मिल गया
परंतु जितनी दुश्मनी आज हम उन इतिहास की बातों को लेकर मानते हैं, देखना चाहिए कि गुरु गोबिंद सिंह जी भी औरंगज़ेब या उनके वंशजो से उतनी ही दुश्मनी मानते थे ?
तथ्य बताते हैं, कि गुरु महाराज के मन मे औरंगज़ेब या मुगल वंश से कोई बैर न था, इसीलिए जब औरंगज़ेब के ही पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने उत्तराधिकार के युद्ध मे अपने भाईयों के विरुद्ध गुरु गोबिंद सिंह जी से सैन्य सहायता मांगी तो गुरु जी ने खुले ह्रदय से मुगल साम्राज्य के हित के लिए बहादुर शाह प्रथम को भारत का शासक बनाने के लिए उसकी सहायता की थी, जो सहायता बिल्कुल भी सम्भव न थी यदि मुगल शासन से गुरु महाराज के मन मे वैसी ही नफरत होती जैसी आज के कुछ सिख भाई करते हैं ॥
[ ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि के लिए हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित इतिहासकार और शोधकर्ता श्री बी. एन. पाण्डेय की लिखी पुस्तक "मुगल विरासत : औरंगजेब के फरमान" पढ़िए ॥ ]
[4] औरंगजेब और गुरु तेग बहादुर
मुगल बादशाह आलमगीर के ऊपर सबसे गम्भीर आरोप ये है कि आलमगीर के आदेश पर सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी को शहीद कर दिया गया, इसके पीछे कारण ये बताया जाता है कि कुछ कश्मीरी पण्डितो ने गुरु महाराज से औरंगज़ेब के विरुद्ध ये कहकर सहायता मांगी कि औरंगज़ेब ने जबरन सब हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन इस्लाम मे करने का आदेश दे दिया है जिस कारण हिन्दुओं पर मुगल सेनाएं बड़े अत्याचार कर रही हैं
गुरु तेग बहादुर ने जब कश्मीरी पण्डितो की सहायतार्थ औरंगज़ेब का जब विरोध किया तो मुगलो ने गुरु महाराज पर भी जबरन इस्लाम कुबूल करने का दबाव बनाया व इस्लाम कुबूल न करने के कारण गुरु महाराज का सर कलम करवा दिया
औरंगजेब पर इतने गम्भीर आरोप निश्चय ही इस कारण लगाए गए क्योंकि औरंगजेब को इस्लाम का गहरा ज्ञान रखने और इस्लाम के नियमों पर जीवन बिताने के कारण जाना जाता है इस कारण औरंगजेब द्वारा किए गए सारे "दुष्कृत्यों" बहुत आसानी से इस्लाम प्रेरित और इस्लामी शिक्षाओं के अनुकूल सिद्ध किया जा सकता था, इससे हिन्दुओं और सिखों के मन मे किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि पूरे इस्लाम धर्म से ही नफरत पैदा हो जाती....॥
खैर मुद्दे पर आएं, तो स्वयं सिख सोर्सेज़ मे लिखा मिलता है कि काज़ी से लेकर आम मुसलमान तक को इस बात का ज्ञान था कि इस्लाम मे तलवार का भय दिखाकर किसी को मुस्लिम बनाना, और मुस्लिम न बनने के जुर्म मे किसी की हत्या करवा देना बहुत ही जघन्य अपराध हैं, तो क्या ये माना जाए कि आम से आम व्यक्ति को भी इस्लामी शिक्षाओं का ज्ञान था केवल बादशाह औरंगज़ेब को नहीं था ?
बहरहाल ये बात हमारे सिख भाई भी जानते हैं कि इस्लाम के अनुसार जबरन इस्लाम कुबूल करवाना पूर्ण रूपेण प्रतिबंधित है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों, महिलाओं, बच्चों और कमजोरो को अकारण सताना एवं अकारण उनकी हत्या करना कुरान की आज्ञा का खुला उल्लंघन और कुफ्र है, क्या हम इस्लाम का गहरा ज्ञान रखने वाले, और अल्लाह का कृपापात्र बनने के लिए जीवन भर एक फकीर की भांति हर प्रकार की सुख सम्पन्नता से विरक्त हो कर जीवन जीने वाले व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं, कि वो सब कुछ जानबूझकर कुरान की आज्ञा का उल्लंघन करेगा और अल्लाह से दुश्मनी करेगा ?
और यदि औरंगज़ेब को अल्लाह से दुश्मनी ही करनी थी, तो अकारण ही पूरा जीवन कष्ट पूर्ण ढंग से बिताने की औरंगज़ेब को क्या ज़रूरत थी ?
और ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि बादशाह को जानबूझकर अल्लाह से दुश्मनी ही करनी थी तो जबरन लोगों को मुस्लिम बनाकर बादशाह को धर्म तो न मिलता, फिर क्या मिलता ?
बाहरी देशों से यूं भी मित्रता नहीं होती थी उस साम्राज्यवाद के दौर मे तिस पर बादशाह अपनी बहुसंख्यक हिंदू जनता का सपोर्ट भी खो बैठते, क्या मिलता बादशाह को ?
वैसे इस चर्चित इतिहास से अलग बादशाह द्वारा जारी ऐसे अनेकों फरमान मौजूद हैं, जिसमें औरन्गज़ेब ने मन्दिर और गुरूद्वारा आदि को अनुदान दिए हैं बादशाह द्वारा हिन्दू साधुओं आदि को दान देते हुए बेहद नम्रतापूर्वक शैली मे लिखी गई चिट्ठियां भी मौजूद हैं, और ये चिट्ठियां व फरमान औरन्गज़ेब के शासन के आरंभ से लेकर अंत तक की तारीख़ो के मिलते हैं, क्या ये तथ्य औरंगज़ेब के चरित्र के विषय मे आम धारणा से अलग नहीं हैं ?
कहने का तात्पर्य ये कि गुरु महाराज की शहीदी यदि मुगल दरबार के कारण ही हुई थी तो उसका कारण हिन्दुओं का जबरन धर्म परिवर्तन हरगिज नहीं था बल्कि अन्य कोई राजनैतिक कारण ही रहा होगा,
ध्यान दीजिए कि गुरु महाराज की मुगल बादशाह से अपनी कोई लड़ाई न थी यानि बादशाह को गुरु महाराज ने स्वयं अपने अनुभव से बुरा नहीं पाया था, बल्कि कश्मीरी पण्डित अपनी विपदा लेकर गुरु महाराज के पास गए थे और इन कश्मीरी पण्डितो पर अत्याचार किए थे कश्मीर के मुगल सूबेदार ने, और जाहिल और भ्रष्ट सूबेदारों द्वारा केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए (न कि बादशाह की आज्ञा पर) जनता पर अत्याचार करना सम्भव है...
यहाँ फिर ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि सिख सोर्सेज और अन्य ऐतिहासिक प्रमाणो से सिद्ध है कि औरन्गज़ेब के शासनकाल मे सरहिन्द के मुस्लिम नवाब और पहाड़ी हिन्दू राजाओं जैसे कुछ मुगल सूबेदार भ्रष्ट और स्वेच्छाचारी थे जो बादशाह से छिपाकर और बादशाह की जानकारी के बगैर प्रजा पर अत्याचार करते थे, और यदि सिख गुरूओं से उन सूबेदारों की भिड़ंत होती थी तो बादशाह के सम्मुख मुकदमा पहुंचने पर अपने कुकृत्यों को बादशाह से छिपाने के लिए वो सूबेदार सिख गुरू पर शासन के विरुद्ध बगावत के झूठे आरोप लगा देते थे ( जैसा षणयन्त्र पहाड़ी राजाओं ने गुरु गोबिंद सिंह जी के विरुद्ध किया था ) तो क्या ऐसा सम्भव नही है कि औरंगज़ेब के सम्मुख गुरु तेग बहादुर जी महाराज पर भी ऐसा ही गम्भीर राजनीतिक अभियोग झूठ बोलकर सम्बन्धित मुगल सूबेदारों ने लगाया हो, जिसे सच मानकर बादशाह ने गुरू महाराज के विरुद्ध आदेश जारी कर दिए हों ।
दोस्तों आप सोचते होंगे कि औरन्गज़ेब का समर्थन मुस्लिम केवल इसलिए करते हैं क्योंकि औरन्गज़ेब मुस्लिम थे , इसलिए मुस्लिम उनके अपराधों पर पर्दा डालते हैं
दोस्तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं, निर्दोष को सताने वाला चाहे हमारा अपना खून ही क्यों न हो, अल्लाह ने हम मुस्लिमों को आदेश दिया है कि हम उसका विरोध करें
तो भाईयों खुद सोचिए कि एक बदनाम इनसान जिसपर हम धर्म परिवर्तित मुस्लिमों के पूर्वजों पर ही घोर अत्याचार करने का आरोप लगाया गया हो उसका समर्थन कर के हम अपना धर्म क्यों खोयेंगे ?
सोचिए जरा यदि किसी अपराधी के केवल मुस्लिम होने के कारण हम उसका बचाव करने लग जाते तो गोबिंद सिंह जी के दो साहिबजादों को दीवार मे चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब और गोबिंद सिंह जी पर जानलेवा हमला करने वाले दो पठानो का उनके तथाकथित मुस्लिम होने के बावजूद हम बचाव क्यों नहीं करते ? बल्कि उनकी कटु आलोचना ही क्यों करते हैं .
औरन्गज़ेब का समर्थन हम मुस्लिम केवल उनके मुस्लिम हो जाने के कारण नहीं, बल्कि तब करते हैं जब हमने उन्हें गैर मुस्लिमों से मुहब्बत और नरमी भरा व्यवहार करते पाया, गैर मुस्लिमों के धार्मिक स्थल बनाने मे सहयोग करते पाया, और गैर मुस्लिमों के साथ न्याय करने मे मुस्लिमों को भी दण्ड देते पाया
यदि हम बादशाह औरन्गज़ेब को सिखों का दुश्मन और गुरु महाराज की धार्मिक द्वेष मे हत्या करने वाला मानते होते, तो हम भी बादशाह औरन्गज़ेब से नफरत ही करते, कहने का तात्पर्य ये कि हमें अपने सिख भाई प्यारे हैं, उनका कोई हत्यारा और दुश्मन नहीं
एक प्वाइंट पर भी गौर करना चाहिए कि यदि गुरु महाराज की हत्या औरंगज़ेब ने अपने शासन के आरम्भिक वर्षों मे ही इस्लाम का प्रसार करने के उद्देश्य से करवा दी थी, तो फिर बादशाह ने गुरु महाराज की शहीदी के बाद इस्लाम का प्रसार किस मजबूरी के तहत नहीं किया और भारत की बहुसंख्य जनता गैर मुस्लिम कैसे रह गई ?
खैर फिर भी सिख भाईयों से औरन्गजेब के विषय मे मै बार बार माफी मांगता हूँ, फिर मांग रहा हूँ कि मेरी बात से किसी का दिल दुखा हो तो वो मुझे नादान समझ कर क्षमा कर दे
लेकिन मै औरन्गजेब के बारे मे लिखने के लिए इसलिए मजबूर हूँ क्योंकि इतिहास का दुरुपयोग कर के भारत मे पहले भी मस्जिद गिराई जा चुकी है और औरन्गजेब के बहाने फिर फासीवादियो की नजर अनेक मस्जिदों पर है ... अगर हम मुस्लिमों ने जनता को जागरूक न किया तो फिर यहाँ एक 6 दिसंबर दोहराया जाएगा
उम्मीद है सिख भाई मेरी चिंता को समझेंगे
जहाँ तक मैंने समझा है अधिकांश सिख भाई नहीं चाहते कि बादशाह औरंगज़ेब के कारण उनका मुस्लिमों के साथ कोई विवाद हो, पर जब मुस्लिमों को बादशाह औरंगज़ेब की ज्यादा तारीफ करते देखते हैं तो उन्हें बुरा लगना स्वाभाविक ही है, क्योंकि सिख भाईयों का विचार है कि औरंगज़ेब द्वारा कश्मीरी हिन्दुओं का जबरन धर्म परिवर्तन कराने का विरोध करने और औरंगज़ेब के सामने इस्लाम कुबूल करने की शर्त न मानने पर नवंबर 1675 मे औरंगज़ेब के आदेश पर गुरु तेग बहादुर जी महाराज और उनके तीन शिष्यो भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी को अत्यंत कष्ट देकर शहीद कर दिया गया था ॥
पर ये पूरा समाचार हमारे भाईयों को कहाँ से मिला ?
गौरतलब है कि गुरु महाराज की गिरफ्तारी और न ही उन्हें दण्ड दिए जाने का कोई तत्कालीन रिकार्ड न ही मुगल और न ही सिख स्रोतों में उपलब्ध है। हिन्दू और यूरोपियन इतिहासकार जो बादशाह औरंगज़ेब और गुरु महाराज के समकालीन थे उन्होंने भी इस महत्वपूर्ण और अतिगम्भीर घटना पर एक शब्द भी क्यों नहीं लिखा, ये सोचने की बात है,
गुरु तेग बहादुर जी के पुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी ने "बचित्तर नाटक" में इस विषय में केवल इतना लिखा है, कि गुरु तेग बहादुर ने तिलक और जनेऊ की रक्षा का काम किया, और साधुओं और धर्म की रक्षार्थ अपना शीश दे दिया, गुरु महाराज ने चमत्कार आदि नही दिखाये क्योंकि प्रभु के बन्दे इस प्रकार के गलत कर्मों को करने से घृणा करते हैं.
गौरतलब है कि जहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी ने बचित्तर नाटक में कई घटनाओं और पात्रों का उनके नामों के साथ विस्तार से वर्णन किया है, बल्कि अन्य घटनाओं में औरंगज़ेब का नाम भी लिया है, वहीँ गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी पर उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, न ही उस स्थान पर किसी आक्रोश का प्रदर्शन किया है.
इसके अतिरिक्त इस विषय मे जो भी रिकार्ड उपलब्ध हैं, वो इस घटना से 100 साल के भी बाद के लिखे गए हैं,
इन रिकार्ड्स मे भी घटना वैसी नहीं लिखी जैसी आजकल सुनी सुनाई जाती है
इस दुर्घटना का सबसे पहला रिकार्ड भारत मे ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज स्थापित होने के बाद किसी मुंशी गुलाम हुसैन द्वारा 1786 के आसपास लिखी गई पुस्तक "सियार उल मुतअख्खेरीन" मे होना बताया जाता है, हालांकि ये पुस्तक पहली बार दुनिया के सामने 1833 मे आई और इससे पहले 1789 और 1832 मे इसके दो अलग अलग खण्डो के अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हो गए, जिसमें सन् 1832 मे ल्यूटिनेण्ट जॉन ब्रिग्स के द्वारा किए अनुवाद मे पहली बार गुरु तेग बहादुर जी की शहादत का जिम्मेदार मुगल दरबार को बताया गया,
इस पुस्तक के अनुसार "मुग़ल राज्य के कुछ सूबेदारों ने बादशाह औरंगज़ेब जो कि उस समय अफगानिस्तान के "हसन अब्दाल" नामक स्थान पर डेरा जमाए हुए थे, को पत्र लिखकर गुरू तेग बहादुर जी महाराज पर झूठा आरोप लगाते हुए बताया कि गुरु तेग बहादुर, और हाफ़िज़ आदम नाम का मुस्लिम फकीर अराजक व्यक्ति हैं, ये दोनों राज्य की जनता से जबरन धन उगाही की कार्रवाइयां कर रहे हैं, और यदि दोनों को रोका नही गया तो राज्य में भारी असंतोष फैल जाएगा" ये पढ़कर बादशाह ने हसन अब्दाल से ही पत्र लिखकर गुरु तेग बहादुर जी, और हाफिज आदम को गिरफ्तार किये जाने संबंधी फ़रमान पत्र के ज़रिये दिल्ली भेज दिया जिसके बाद गुरु महाराज व हाफ़िज़ आदम को सन 1675 में लाहौर के गवर्नर ने गिरफ्तार कर लिया !!"
हालांकि ये सब कथित घटना के 100 साल बाद बिना किसी सबूत के लिखा गया है, और हमारी समझ से तो इस कहानी के द्वारा अंग्रेज सिखों को मुगल राज के खिलाफ खड़ा करने की साजिश कर रहे थे
पर यदि इस कहानी मे सत्यता का अंश माना जाए तो इस मे बताये गए वृत्तान्त मे कहीं भी औरंगज़ेब द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन का जिक्र नहीं है, जबकि ये प्रमाण अपने आप मे पहला होने के कारण बाकी प्रचलित कहानियों से ज्यादा प्रमाणिक माना जाएगा, और इस प्रमाण के अनुसार औरंगज़ेब इस पूरे प्रकरण के समय दिल्ली या उसके आसपास मौजूद नहीं थे, न ही बादशाह ने गुरु महाराज को मृत्युदण्ड दिया था, बल्कि इस पाप के दोषी मुगल सूबेदार और दरबार के मन्त्री थे न कि औरंगज़ेब ॥
अन्य ऐतिहासिक स्रोत भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि 1675 मे गुरु महाराज की शहादत के समय बादशाह दिल्ली मे नहीं थे, तथ्य ये है कि 1672 ईस्वी मे अफगानिस्तान के आफरीदी सरदार अकमल खान ने स्वतंत्र अफगान राज्य बनाने के उद्देश्य से विद्रोह का झण्डा बुलंद किया जिस विद्रोह के सरलता से शान्त न होने के कारण जुलाई 1674 मे औरंगज़ेब को खुद अफगानिस्तान जाना पड़ा, इस विद्रोह को शक्ति और कूटनीतिक प्रयासों से पूरी तरह शांत करने मे एक वर्ष से अधिक समय लगा, जिस अवधि मे बादशाह हसन अब्दाल (रावलपिंडी के पास एक स्थान) मे ही रूका रहा ॥
प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार जो कि मुगल दौर के शाही फरमानो का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए विख्यात हैं, उन्होने भी अपनी पुस्तक "Aurangzeb and His Times" मे औरंगज़ेब के हसन अब्दाल से वापस दिल्ली लौटने की तिथि 27 मार्च 1676 बताई है ॥
आधुनिक समय मे पटियाला स्थित पंजाबी युनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. फौजा सिंह ने 1974 मे इसी विषय मे अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने भी इसी तथ्य का समर्थन किया किया कि 1675 की सर्दियों मे यानी गुरु महाराज की शहादत के समय औरंगज़ेब दिल्ली मे मौजूद नहीं थे ॥
बाद में अलगाववादियों ने इस घटना को औरंगज़ेब के सम्मुख हुआ बता दिया, और औरंगज़ेब की जबरन धर्म परिवर्तन की नीति के फल में हुआ बताया, लेकिन अगर हम इस दुर्घटना के प्रथम स्रोत को सच्चा मानते हैं, तो इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार केवल जनता से धन वसूलने पर मृत्युदंड का कोई प्रावधान नही बनता
दूसरा स्रोत 1842 में मुहियुद्दीन बूटे शाह ने "तारीख़-ए-पंजाब" में लिखा है कि राम राय यानि गुरु हरकिशन के बड़े भाई गुरु तेग बहादुर जी के ख़िलाफ़ हो गए थे, राम राय ने मुग़ल दरबार को गुरु तेग बहादुर जी के ख़िलाफ़ ये कहकर उकसाया कि गुरु तेग बहादुर जी को अपनी आध्यात्मिकता पर बहुत दम्भ हो गया है, जो दम्भ बिना दंड के खत्म नही होगा, राम राय ने सुझाव दिया कि वो गुरु तेग बहादुर से चमत्कार दिखाने को कहे, और अगर गुरु तेग बहादुर चमत्कार न दिखा पाएं तो उन्हें दंड दिया जाये. हालाँकि गुरु तेग बहादुर जी द्वारा चमत्कार न दिखाने की बात गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित बचित्तर नाटक से मेल खाती है, पर इस स्रोत पर भी सतीश चंद्र एवं अन्य इतिहासकारों ने अधिक विश्वास नही किया है
वैसे तथ्यों पर गौर करने पर पहले तो इस पूरे परिदृश्य में बादशाह औरंगज़ेब का जोड़ा जाना संदेहास्पद है क्योंकि इतिहास से सिद्ध है कि जिस वर्ष गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी हुई, उस वर्ष यानि 1675 में औरंगज़ेब दिल्ली में नही थे, यानी इस बीच के समय में औरंगजेब ने जिसे अस्थायी रूप से दिल्ली की व्यवस्था सम्हालने को सौंपी थी, गुरु महाराज का शहीदी का अपराध उस व्यक्ति के सर जाता है
दूसरी बात, ये अवश्य है कि गुरु तेग बहादुर जी महाराज के वे शत्रु जिनको गुरु महाराज की शहीदी से कोई लाभ मिलने की उम्मीद थी, और जिनकी पहुँच मुग़ल दरबार तक थी, इन लोगों ने कोई न कोई बड़ा षणयंत्र गुरु तेग बहादुर जी महाराज के खिलाफ ज़रूर किया था, और क्योंकि तत्कालीन सिखों को मालूम था कि इस दुर्घटना के दोषी मुगल दरबार की बजाये कोई अन्य ही लोग हैं इसीलिये उन्होंने और गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी पर मुगल राज्य या बादशाह औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ किसी रोष का प्रदर्शन नही किया था !
[5] सिख और मुसलमानों के बीच में कड़वाहट
अक्सर देखता हूँ की सिख और मुसलमानों के बीच में कड़वाहट पैदा करने के लिये लोग मुगल बादशाह औरंगज़ेब द्वारा जबरन हिंदुओं के धर्मान्तरण और उसका विरोध करने पर सिखों के नवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी महाराज और, गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के साहिबज़ादों की हत्या औरंगज़ेब द्वारा करवाने की बातें उछालते हैं, कई सिख भाई इन बातों पर यकीन कर के बादशाह औरंगजेब को बुरा भला भी कहते हैं, और औरंगज़ेब के पक्ष में बोलने वाले मुस्लिमों से नफरत भी करने लगते हैं, पर उन्हें देखना चाहिए कि क्या गुरु गोबिंद सिंह जी या तत्कालीन सिख भी औरंगज़ेब को इतना ही दोषी मानते थे ?
आज गुरु तेग बहादुर जी महाराज का हत्यारा औरंगज़ेब को बताया जाता है, जबकि ऐतिहासिक दस्तावेज़ ये सिद्ध करते हैं कि गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के समय यानि 1675 के पूरे वर्ष में औरंगज़ेब दिल्ली में थे ही नही बल्कि अफगानिस्तान के हसन अब्दाल में थे, और गुरु महाराज की सज़ा ए मौत देने में औरंगज़ेब का हाथ नही था, बल्कि राजधानी से दूर जाते समय औरंगज़ेब ने पॉवर ऑफ अटॉर्नी अपने जिस मंत्री को सौंपी थी, वो व्यक्ति ज़िम्मेदार था, गुरु गोबिंद सिंह जी भी औरंगज़ेब को अपने पिता का हत्यारा नही मानते थे, गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा चमकौर के युद्ध के बाद औरंगज़ेब को संबोधित कर के लिखे गए पत्र "जफरनामा" की चन्द पंक्तियों से ये बात स्पष्ट हो जाती है ,
गुरु महाराज लिखते हैं "न दानम कि ई मरदि रोबाह पेच" (24), यानि मैं ये बात नही जानता था कि ये व्यक्ति (औरंगज़ेब) धोखेबाज़ है, इसी तरह आगे लिखा है "न दानम कि ई मरदि पैमां शिकन" (45)
यानि मैं ये बात नही जानता था कि ये व्यक्ति (औरंगज़ेब) वादे तोड़ने वाला है, इसके अलावा बार बार इस आशय की पंक्तियां भी लिखी हैं कि औरंगज़ेब को मैं धार्मिक व्यक्ति समझता था पर वो धार्मिक व्यक्ति नही है, अब खुद सोचिये कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई व्यक्ति आप के महान संत की हत्या धूर्ततापूर्वक, और धर्म को धता बताकर कर डाले और आप ये न जानते हों कि वो व्यक्ति अधर्मी और धोखेबाज़ है ? इन पंक्तियों से सिद्ध होता है कि गुरु गोबिंद सिंह जी को चमकौर के युद्ध 1704 ईस्वी से पहले बादशाह औरंगजेब के भले व्यक्ति होने का यक़ीन था इसका सीधा सा अर्थ है कि गुरु महाराज औरंगज़ेब को अपने पिता की हत्या का दोषी नही मानते थे,
दूसरा तर्क ये भी है कि सिख क़ौम किसी का उधार न रखने के लिए जानी जाती है, तो अगर 1675 में बादशाह औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर जी की अन्यायपूर्ण ढंग से हत्या करवा दी थी तो सिखों ने कभी इसका प्रतिशोध बादशाह औरंगजेब से क्यों नही लिया ?
और चमकौर के युद्ध के बाद गुरु महाराज ने बादशाह औरंगज़ेब पर जो कटाक्ष किये थे, वे भी दुश्मनी में नही किये थे बल्कि औरंगज़ेब की उस भूल की ओर ध्यान दिलाने के लिये किये थे, जो भूल बादशाह औरंगजेब ने पहाड़ी राजाओं के छल में आकर उनकी सहायता के लिए सिखों के विरुध्द मुग़ल सेना भेजकर की थी.
गुरु महाराज जफरनामा में लिखते हैं "बिबायद कि यजदां शनासी कुनी, न गुफ्तह कसे कस खराशी कुनी" (65) यानि गुरु महाराज ने बादशाह औरंगजेब से कहा है कि "तुम्हे चाहिये कि तुम खुदा को पहचानो, और "किसी की" बातों में आकर लोगों को कष्ट न पहुँचाओ" स्पष्ट है कि औरंगज़ेब ने किसी अन्य (पहाड़ी राजाओं) की झूटी बातों में आकर मुग़ल सेना सिखों के विरुद्ध भेजी थी, न कि अपने किसी स्वार्थ में, और ये बात गुरु महाराज ने जफरनामा में स्पष्ट की है,
"मनम कुश्तहम कोहियां पुरफितन, के आँ बुतपरस्तां दूं मन बुत शिकन" (95) यानि मैंने जिन पहाड़ी राजाओं से युद्ध किये थे,वो उपद्रवी हैं, वे मूर्तिपूजक हैं, और मैं मूर्तिभंजक, बात ये थी कि सिख गुरुओं ने उस समय समाज में फैली ऊंच नीच, छुआछूत आदि कुप्रथाओं पर सीधा प्रहार किया था, गुरु महाराज ने खुद को बुत शिकन शब्द इसी संदर्भ में लिखा था कि वो इन कुप्रथाओं को तोड़ रहे थे,
इसी सन्दर्भ में गुरु महाराज ने बार बार औरंगज़ेब से धर्म को समझने के लिये भी कहा है, यानि कि औरंगज़ेब कुप्रथाओं को बढ़ावा देनेवालों का साथ न दें, सिखों द्वारा पाखंड विरोधी मुहीम से रूढ़िवादी पहाड़ी राजा गुरु महाराज के शत्रु बन गए थे, लेकिन ये राजे खुद इतने शक्तिशाली नही थे कि सिखों से लड़कर उनका दमन कर सकते इसलिये उन्होंने मुग़ल राज को सिखों से लड़ाने की साज़िशें रचनी शुरू कर दीं, और औरंगज़ेब के पास बार बार ये सन्देश भिजवाने शुरू कर दिए कि ये सिख गुरु जनता को मुग़ल राज से बगावत के लिये उकसा रहे हैं,
औरंगज़ेब से गलती ये हुई कि पूरी सच्चाई जाने बगैर औरंगज़ेब ने सिखों के खिलाफ लड़ने के लिये पहाड़ी राजाओं के समर्थक वज़ीर खान को अनुमति दे दी, जिसकी आड़ लेकर सरहिंद के धूर्त नवाब वज़ीर खान ने गुरु साहिबान पर भयंकर ज़ुल्म तोड़े, पर वज़ीर खान के इस कुकृत्य में इस्लाम या मुस्लिमों का कोई बीच नही था, बल्कि मालेरकोटला के नवाब ने सरहिंद के नवाब को इस्लाम के नाम पर रोका भी कि इस्लाम में नाबालिगों का कत्ल हराम है, और गुरु साहिबान ने ऐसा कोई जुर्म नही किया जिस पे उन्हें सज़ा ए मौत दी जाए लेकिन सूबा ए सरहिंद का क्रूर नवाब न माना और इस्लाम की दुहाई भी न मानी.
खैर सिखों ने जल्द ही सरहिंद के नवाब को नरक पहुंचा दिया, और उसे और उसके सहयोगियों के पाप की बराबर सज़ा दे दी गई जब बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सन 1710 में सरहिंद पर सिख फ़ौज ने आक्रमण किया, ये बात ख़ास गौर करने की है पहाड़ी राजाओं के उकसावे पर सिख गुरुओं पर ज़ुल्मम करने वाले वास्तविक दोषी वज़ीर खान से प्रतिशोध पूरा हो चुका है
तब इन घटनाक्रमों का दोषी सिखों ने औरंगज़ेब या अन्य मुस्लिमों को नही माना था, इसीलिये तत्कालीन सिखो ने मुग़ल राज्य के ख़िलाफ़ ऐसा कोई अभियान नही किया, जैसा सरहिंद के ख़िलाफ़ किया था
तत्कालीन सिख औरंगज़ेब से दुश्मनी इस कारण भी नही रखते थे क्योंकि गुरु गोबिंद सिंह महाराज ने जफरनामा में औरंगज़ेब के प्रति किसी शत्रुता का प्रदर्शन नही किया बल्कि एक हितैषी का सा व्यवहार किया है, गुरु महाराज लिखते हैं "बिबायद तू दानिश परस्ती कुनी, बकारे शमा चीरह दस्ती कुनी" गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने औरंगज़ेब को मशवरा दिया है कि "औरंगज़ेब, तुम्हें चाहिए होशियार बनो और दृढ़ता से अपना काम करो (यानि किसी अन्य के कहने में न आकर अपने फैसले पर अडिग रहो) एक शुभचिंतक ही इस प्रकार के मशवरे राज्य के शासक को दे सकता है, कि शासक अपनी कमियां दूर करे जो उसको और उसके शासन को नुक्सान पहुँचा सकती हों, निश्चित है कि ऐसी सलाह शासक को देने वाला चाहता है कि ये शासक पद पर रहे, न कि पदच्युत हो
बताइये अगर औरंगज़ेब को गुरु महाराज भ्रष्ट शासक मानते तो गुरु वे औरंगज़ेब को शुभचिंतक बनकर सलाह देते, जफरनामा के 89 से लेकर 93 क्रम के शेरों में गुरु महाराज ने बादशाह औरंगज़ेब के चारित्रिक गुणों का ज़िक्र करते हुए बादशाह को रौशन ज़मीर (सद्चरित्र), बख्शीश कबीर (बेहद उदार), मलायक सिफ़त (फरिश्तों जैसे गुणों वाला) वगैरह कहा है,
खुद सोचिये ये उपाधियां वे किसी ऐसे व्यक्ति को कैसे दे सकते थे जिसे वो अपने परिवारीजनों की हत्या का मुख्य दोषी मानते ?
तो सच्चाई एकदम स्पष्ट है, बात उसपर केवल गौर करके समझने की है.
जफरनामा में ही गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज लिखते हैं कि औरंगज़ेब, अगर तुम मुझसे मिलना चाहते हो तो तुम मेरे पास कांगड़ गाँव आने में बिलकुल देर न करो, और यहाँ तुम्हारी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा.
और गुरु साहिब ने 83वें शेर में ये भी लिखा है कि औरंगज़ेब आगे से अगर भलाई करने को तैयार हो जाएं तो खुदावंद क़रीम औरंगज़ेब को बेहतर इनाम देगा.
ये बातें भी साबित करती हैं कि गुरु महाराज को मुग़ल बादशाह से कोई द्वेष नही था, सिख स्रोत ही ये भी बताते हैं कि ये खत पाकर औरंगज़ेब को हद से ज़्यादा अफ़सोस हुआ लेकिन वक़्त ने बादशाह औरंगजेब को दक्कन से वापस आकर अपनी गलती सुधारने का मौका ही नही दिया, 1707 में दक्कन में ही औरंगज़ेब का देहांत हो गया.
अलबत्ता इससे पहले औरंगज़ेब ने सिखों के ख़िलाफ़ मुगलों द्वारा कोई एक्शन न लिये जाने के फरमान ज़रूर जारी कर दिए थे.
औरंगज़ेब के बाद खाली हुई राज गद्दी पर शहज़ादे बहादुर शाह प्रथम को बैठाने में गुरु गोबिंद सिंह जी ने ख़ास मदद कर के एक बार फिर इस बात का सबूत दिया था कि उन्हें मुगलों से कोई बैर नही है. बल्कि वो मुगल राज के हितैषी ही हैं !!
ये तथ्य सर्वविदित है कि पहले अंग्रेजों ने भारतीय समुदायों को आपस मे लड़ाने के लिए इतिहास बदला, और बाद मे स्वतंत्र भारत के स्वार्थी राजनीतिज्ञों ने इतिहास मे हेर फेर कर के कुछ समुदायों को हमेशा डराए रखने की चाल चली.
अब इस झूठे इतिहास से जो अल्पसंख्यक समुदाय नुकसान मे रहे हैं वो जगह जगह से तथ्य खोजकर इतिहास मे खुद पर लगे आरोपों का विरोध करते हैं ।
छह महीने पहले हमारे एक सिख भाई ने ये तस्वीर पोस्ट करते हुए बताया था कि
जागो सिख जागो भारत की किताबो में क्या पढाया जा रहा है? कुछ इस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है.
(गुरुनानक देव का उपदेश था विकल्प 1.मनुष्य में भाईचारा. 2.सिखों को आंतकवादी संगठन बनाना. 3. सिख मत का एक मत धर्म बनाना. 4. सिखों की एकता)
देश पर मिटने वालो को परीक्षा मंडल ने बताया आंतकी.
जागो सिख जागो आरएसएस देश में अराजकता फैला रही है और सिखों को आंतकवादी घोषित करने में लगी हुई है ये सब एक सोची समझी तहत के साथ हो रहा है
बेशक ये झूठा इतिहास सिख धर्म के समूल नाश की घिनौनी साजिश के तहत लिखा गया था , और इन झूठे तथ्यों के कारण भारत के हजारों निर्दोष सिखों को 80 और 90 के दशक मे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था ॥ इसी कारण सिखों के साथ उनके विरुद्ध लिखे गए इस झूठे इतिहास का हम मुस्लिम भी हमेशा विरोध करते हैं ।
इसी तरह इतिहास मे कुछ मुस्लिम शासकों के विरुद्ध हिन्दू दुश्मनी के बड़े ही गम्भीर आरोप लगाए गए जिनके नतीजे मे 92 और 2002 मे हजारो मुस्लिमों की निर्मम हत्या कर डाली गई
लेकिन जब हम मुस्लिमों के विरुद्ध अकारण हिंसा रोकने के लिए मुस्लिमों के विरुद्ध लिखे गए इस झूठे इतिहास के खिलाफ तथ्य लाते हैं. तो यही भाई हमारा प्रबल विरोध करते हैं
भाई इतिहास के हमेशा दो मुंह होते हैं. एक आपके पक्ष मे, दूसरा विपक्ष में और मैं या आप हमेशा अपने पक्ष के इतिहास को ही मान्यता देते हैं (और यदि साक्ष्य हमारे पक्ष मे हों तो फिर सच्चाई पर भी हम ही हैं )
अब देखिए जो इतिहास औरन्गज़ेब को धर्मान्ध हत्यारा बताता है वही इतिहास सिखों को आतंकवादी संगठन बताता है
लेकिन न हम औरन्गजेब को धर्मान्ध हत्यारा मानते हैं, और न ही आप सिखों को कोई आतंकवादी संगठन. क्योंकि इस इतिहास की विश्वसनीयता पर हमने सवाल उठाया है, जिससे औरन्गज़ेब के साथ ही साथ सिखों पर लगाए आरोपों की विश्वसनीयता भी हमारी नजर मे बाकी नहीं रही.
पर आपका अजीब है उसी इतिहास को नकार कर सिखों पर आतंकी धर्म होने के आरोप झुठलाते हो ( हम भी सिखों पर आतंकी धर्म होने के इस मिथ्या आरोप को झूठा कहते हैं ) पर उसी इतिहास मे जब औरन्गज़ेब को धर्मान्ध हत्यारा कहा जाता है,
तो आप उस इतिहास के एक एक शब्द पर विश्वास की मुहर लगाते हो.
क्या ये दोगलापन नहीं ?
[6] जिज़या
औरंगज़ेब ने अपने शासन काल मे हिन्दुओं पर जिज़या नामक धार्मिक कर लगा दिया था
इस एक उक्ति से औरंगज़ेब की छवि एक तानाशाह की बनाकर पेश की जाती है, और जिज़या की छवि इस्लामी निर्दयता की एक निशानी की
लेकिन जब मैंने जिज़या के बारे मे इतिहास और इस्लामी कानून का अध्ययन किया तो पाया कि जिज़या इस्लामी सल्तनत मे गैर मुस्लिमों की सुविधा के लिए लिया जाने वाला कर था , असल मे साम्राज्यवादी व्यवस्था मे राज्य के हर नागरिक के लिए इस्लामी शासन मे सैनिक सेवा देना अनिवार्य था, पर राज्य के गैर मुस्लिमों को इस विषय मे ये छूट थी कि यदि वे राज्य को सैन्य सहायता न देना चाहें तो एक मामूली सी रकम चुका कर इस जिम्मेदारी से बच सकते थे ll इसी रकम का नाम जिज़या था, साथ ही यदि कोई गैर मुस्लिम सैन्य सहायता देना चाहता तो उससे जिज़या भी नहीं लिया जाता था .
आज के समय मे हम जिज़या का समीकरण आयकर से कर सकते हैं, क्योंकि इन्कम टैक्स मे ही देश के रक्षा बजट की धनराशि भी वसूली जाती है जनता से
आज भारत मे इन्कम टैक्स के दायरे मे आने वाले नागरिकों से 10% से 30% तक टैक्स लिया जाता है, इसलिए ये बढ़ती आय के साथ बढ़ति जाता है, लेकिन मुस्लिम काल मे न तो इतनी ऊंची प्रतिशत मे जिज़या लिया जाता था, न ये जिज़या बढ़ती आय के साथ बढ़ता था, क्योंकि निश्चित रकमो पर एक दर तय कर दी गई थीं, और उन तय दरो से अधिक जिज़या नहीं लिया जाता था
(200 dirham ki salana income pe 12 dirham jizya, 200 se leke 10,000 dirham pe 24 dirham aur10,000 dirham se kitni bhi zyada salana income par 48 dirham liya jata tha
Bharteey Itihas/Nagendr pratap singh/page:140
क्योंकि जिज़्या सैन्य सहायता का बदल था इसलिए ये केवल उन पुरुषों से लिया जाता था जो धनवान और शक्ति सम्पन्न थे, पर राज्य को सैन्य सहायता नहीं देना चाहते थे और जिज़या उन लोगों से नहीं लिया जाता था जो प्राकृतिक रूप से ही सैनिक सहायता नहीं दे सकते थे, जैसे साधु सन्यासियों, कमजोर और बीमार लोगों, बूढ़े लोगों, अकेली स्त्रियों , अनाथ बच्चों और ब्राह्मणो से भी बिल्कुल नहीं लिया जाता था चाहे वो कितने ही अमीर और समर्थ क्यों न हों
Bharteey itihas/page:90 & 140
लोग बादशाह औरंगज़ेब द्वारा जिज़या कर फिर से लागू कर देने की बात बहुत उछालते हैं, लेकिन 800 वर्ष के पूरे मुस्लिम शासन काल मुस्लिमों से ज़कात नामक धार्मिक कर वसूला जाता था इसका कोई जिक्र नहीं करता.खैर फिर भी हम सन्दर्भ ढूंढ लाए हैं कि "मुस्लिमों से ज़कात एक कर के रूप मे पूरे, मुस्लिम काल मे वसूला जाता रहा ॥"
(मध्यकालीन भारत /एल.पी. शर्मा, पेज-248-249, संसकरण 1999) और [Bharteey itihas/page:140]
जबकि जिज़या हिन्दू प्रजा पर अनेक मुस्लिम सुल्तानो ने बिल्कुल नहीं लगाया, और 332 वर्ष के पूरे मुगलकाल मे केवल तीन शासकों को छोड़कर बाकी किसी शासक ने प्रजा पर जिज़या नहीं लगाया ॥
और क्योंकि ज़कात बिल्कुल इन्कम टैक्स की तरह बढ़ती आय के साथ बढ़ता जाता है इसलिए ज़कात मे मुस्लिम उससे कहीं अधिक रकम अदा करते थे जितनी रकम गैर मुस्लिम जिज़या के रूप मे अदा करते थे, ज़कात के मुकाबले मे जिज़या बहुत मामूली रकम देते थे ।
“और इस तथ्य की भी बिल्कुल चर्चा नहीं की जाती कि गद्दी पर बैठते ही औरंगज़ेब ने 80 करों को समाप्त कर दिया था, जिनमें अनेक धर्म आधारित कर भी शामिल थे जो बादशाह औरंगज़ेब के पूर्वजों ने जनता पर लगाए थे जिन्हें औरंगज़ेब ने समाप्त कर दिया
मुगलकालीन भारत /डा. लईक अहमद , पेज-177-178, संसकरण 2003
आज के जमाने मे भारतीय मुस्लिम हिन्दुओं के बराबर ही इन्कम टैक्स अदा किया करते हैं जबकि मुस्लिम किल मे हिन्दू जिज़या अदा किया करते थे जो मुस्लिमों के टैक्स शेयर से काफी कम था.
आज अगर भारत मे मुस्लिमों से जिज़या जैसा टैक्स लिया जाने लगे तो हम खुशी से देंगे क्योंकि मज़हब के नाम पर हम उससे बहुत कम टैक्स देंगे जितना अभी हमको देना पड़ता है ॥
[7] औरंगजेब खूखार और बेदर्द बादशाह
जहाँ का शासक अत्याचारी होता है, उस राज्य मे बहुत जल्दी विद्रोह के स्वर फूटते हैं, और जहाँ अत्याचार हद से बढ़ जाता है, वहाँ कायर से कायर व्यक्ति भी विद्रोही बन जाता है, ये एक सार्वभौमिक सत्य (Universal Truth) है, और ये सत्य हमारे देश मे भी पूरी तरह लागू होता है,
धर्म, जिसके लिए हमारे देशवासी मरने मिटने को तैयार रहते हैं 1857 मे गाय की चर्बी लगे कारतूसों के कारण जब इसी धर्म पर खतरा दिखा तो हमारे देशवासियों ने मुगल बादशाह को अपना नायक बनाकर अभूतपूर्व क्रांति कर डाली ॥
लेकिन इस क्रांति के ठीक एक सौ पचास वर्ष पहले के बारे मे एक अजीब सी बात बोली जाती है कि मुगल बादशाह औरंगजेब मन्दिरो को तोड़ने वाला, हिंदूओ पर ज़ुल्म ढाने वाला, गैर मुस्लिमों को तलवार के बल पर मुसलमान बनने पे मजबूर करने वाला, खूखार और बेदर्द बादशाह था जिसने हजारों से ज्यादा हिन्दुओं के जनेऊ काटकर, उन को प्रताड़ित कर कर के मुसलमान बनने पर मजबूर कर दिया था,
लेकिन हैरत की बात है इतना अत्याचार होने के बावजूद इतिहास मे कहीं भी एक भी ज़िक्र नहीं मिलता कि हिन्दू समुदाय के किसी भी संगठन ने कभी धार्मिक कारणों से औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह किया हो, जबरन धर्म परिवर्तन के विरोध मे किसी हिन्दू सेनानायक ने औरंगज़ेब की सत्ता के विरुद्ध हथियार उठाया हो
क्या औरंगज़ेब के समय मे हिन्दू शक्ति इतनी कुंद हो चुकी थी, कि जान से प्यारे धर्म पर बड़े से बड़ा कुठाराघात होते देखकर भी अन्यायी शासक औरंगज़ेब के विरुद्ध हथियार उठाने की हिम्मत किसी भी हिन्दू योद्धा मे न थी ?
नहीं हिन्दू शक्ति औरंगज़ेब काल मे भी कतई कुंद न थी, औरंगज़ेब के विरुद्ध हथियार उठाने की शक्ति और साहस अनेकों हिन्दुओं मे था, अनेकों हिन्दुओं ने औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह और युद्ध किए भी, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इनमें से एक भी विद्रोह और युद्ध हिन्दू धर्म की रक्षा और जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध नहीं था देखिए
1- जाट विद्रोह (1669 और 1685 ईसवी) : इतिहासकार औरंगज़ेब के शासनकाल मे हुए पहले संगठित विद्रोह, जाट विद्रोह को धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक कारणों से हुआ विद्रोह बताते हैं क्योंकि विद्रोही तख्तापलट के प्रयासों की बजाय महल मकबरों आदि मे रखी सम्पत्ति को लूटा करते थे इस विद्रोह को दबाने मे आमेर के राजपूत राजा बिशन सिंह ने मुगलो का भरपूर साथ दिया था ॥
2- सतनामी विद्रोह (1672 ईसवी) : ये विद्रोह भी औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियों के कारण न होकर एक सतनामी के एक मुगल सैनिक से झगड़ा होने के बाद शुरू हुआ, इस विद्रोह को दबाने मे स्थानीय हिंदू जमींदारो (मुख्यत: राजपूत) ने मुगलो का साथ दिया था ॥
3- बुन्देलों का विद्रोह (1661 ईसवी) : उत्तराधिकार युद्ध मे दारा शिकोह के विरुद्ध औरंगज़ेब के सहयोगी रहे चम्पतराय (ओरछा का शासक) जिन्हें औरंगज़ेब ने पंच हजारी मनसब और सम्मानसूचक खिताब दिया हुआ था, इन चम्पतराय ने बाद मे किसी कारण से औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह किया लेकिन पराजित हो गए और आत्महत्या कर ली, चम्पतराय के पुत्र छत्रसाल ने इस के बाद कुछ समय तक मुगल संधि स्वीकार की और पुरन्दर की सन्धि और बीजापुर युद्ध मे मुगलो की सराहनीय सेवा की पर बाद मे छत्रसाल ने भी मुगलो के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, 1705 मे छत्रसाल ने औरंगज़ेब के साथ संधि कर ली, फलस्वरूप छत्रसाल को 4000 का मनसब और राजा घोषित किया ( छत्रसाल की हत्या या जबरन इस्लाम कुबूल नहीं करवाया)
4- अहोमो का विद्रोह (1663) : असम के अहोमो से भी औरंगज़ेब के समय मे संघर्ष चला 1663 मे मुगलो ने अहोमो को परास्त कर के संधि के लिए विवश किया (जबरन धर्म परिवर्तन या हत्या नहीं)
5- राजपूत विद्रोह (1679) : राजपूतों से औरंगज़ेब का संघर्ष जोधपुर के शासक जसवंत सिंह का उत्तराधिकारी जसवंत सिंह के भाई के पोते इन्द्र सिंह को औरंगज़ेब द्वारा घोषित करने के बाद शुरू हुआ जब जसवंत सिंह के देहान्त के बाद जन्मे उसके पुत्र अजीत सिंह ने औरंगज़ेब के इस फैसले का विरोध किया ... यहाँ भी युद्ध के पीछे जबरन धर्म परिवर्तन जैसी कोई बात न थी ॥
6- सिख विद्रोह (1675 और 1704 ईसवी) : कई लोग इसे औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियों के विरुद्ध हुआ इकलौता विद्रोह बताते हैं, हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेज इस थ्योरी की पुष्टि नहीं करते, ऐतिहासिक साक्ष्य सिद्ध करते हैं कि सिख गुरुओ के बढ़ते प्रभाव से डरकर उनके विरुद्ध कुछ मुगल मनसबदारो ने (जिनमें मुख्य पहाड़ी हिन्दू राजा थे) षणयन्त्र रचे, जिस कारण सिख मुगल संघर्ष शुरू हुए, इन संघर्षो के पीछे औरंगज़ेब द्वारा हिन्दुओं के जबरन धर्म परिवर्तन की कहानी जोड़ना कुचेष्टा मात्र है !!
7- मराठो से संघर्ष : इसी बीच अफगान विद्रोह, शहजादा अकबर का विद्रोह और पुर्तगालियों से भी औरंगज़ेब का संघर्ष हुआ लेकिन क्योंकि इन संघर्षो का सम्बन्ध हिन्दुओं से नहीं है इसलिए इनकी चर्चा करना विषयसंगत नहीं है, मराठा शासक शिवाजी से औरंगज़ेब के युद्धो को भी कुछ लोग जबरन धर्म परिवर्तन की नीति के विरुद्ध युद्ध प्रचारित करते हैं, लेकिन वास्तविकता ये है कि शिवाजी ने तो मुगल साम्राज्य पर पहला आक्रमण 1656 ईसवी मे तभी कर दिया था जब औरंगज़ेब शासक भी नहीं बने थे, सो इन युद्धो को विशेषकर औरंगज़ेब और उनकी तथाकथित धार्मिक नीति से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है,
फिर इस पर भी ध्यान दीजिए कि शिवाजी ने एक नहीं बल्कि दो दो बार युद्ध हार कर औरंगज़ेब के साथ संधि की थी और बीजापुर के युद्ध मे औरंगज़ेब के साथ मिलकर युद्ध लड़ा था प्रश्न ये है कि अगर शिवाजी धर्म के लिए युद्ध कर रहे थे तो फिर "अधर्म" के साथ संधि कर के अधर्म के लिए युद्ध लड़ना उन्होंने कैसे गवारा कर लिया ?
प्रश्न ये भी हैं कि औरंगज़ेब का लक्ष्य यदि जबरन धर्म परिवर्तन ही था तो हारने वाले हर विद्रोही के साथ औरंगज़ेब उसका धर्म परिवर्तन या हत्या की बजाय संधि कर के उसे शासन की बागडोर क्यों सौंप देते थे ?
और यदि औरंगज़ेब का काम हिन्दू धर्म का दमन करना था तो हर हिंदू, अहिंदू विद्रोह को दबाने मे औरंगज़ेब के हिन्दू मनसबदार ही क्यों आगे आगे रहते थे ?
वास्तविकता तो ये है कि औरंगज़ेब की मुख्य शक्ति ही हिंदू राजा थे, उस समय हुए हर सैन्य विद्रोह को दबाने मे औरंगज़ेब इसीलिए सफल रहे क्योंकि उनके साथ असंख्य हिन्दू शासक थे
सोचकर देखिए जब बिना हिन्दू शक्ति के औरंगज़ेब की शक्ति कुछ भी न थी, तो ऐसी स्थिति मे क्या औरंगज़ेब द्वारा किसी भी तरह हिन्दुओं के जबरन धर्म परिवर्तन की नीति अपनाए जाने की थोड़ी सी भी सम्भावना हो सकती है ?
अगर औरंगज़ेब ने ये नीति अपनाई थी तो किस शक्ति के बल पर ?
और अगर औरंगज़ेब की ये नीति थी तो इतने शक्तिशाली होने के बावजूद किसी हिन्दू नायक ने औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह क्यों न किया, और हिन्दुओं ने ही आगे बढ़ बढ़कर औरंगज़ेब के विरुद्ध हुए तमाम विद्रोहों को कुचल क्यों दिया ?
सोचिए. सोचते रहिए
[8] औरंगज़ेब और कैलाश पर्वत
आज़ादी के बाद चीन ने "कैलाश पर्वत व कैलाश मानसरोवर" और अरुणाचल प्रदेश के बड़े भूभाग पर जब कब्ज़ा कर लिया तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी UNO पहुंचे की चीन ने ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर लिया है, हमारी ज़मीन हमें वापस दिलाई जाए।
इस पर चीन ने जवाब दिया कि हमने भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया है बल्कि अपना वो हिस्सा वापस लिया है जो हमसे भारत के एक शहंशाह ने 1680 में चीन से छीन कर ले गया था।
यह जवाब UNO में आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में मौजूद है। जानते हैं चीन ने किस शहंशाह का नाम लिया था? "औरंगज़ेब" का...
दरअसल चीन ने पहले भी इस हिस्से पर कब्ज़ा किया था, जिस पर औरंगज़ेब ने उस वक़्त चीन के चिंग राजवंश के राजा "शुंजी प्रथम" को ख़त लिख कर गुज़ारिश की थी कि कैलाश मानसरोवर हिंदुस्तान का हिस्सा है और हमारे हिन्दू भाईयों की आस्था का केन्द्र है, लिहाज़ा इसे छोड़ दें।
लेकिन जब डेढ़ महीने तक किंग "शुंजी प्रथम" की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो औरंगजेब ने चीन पर चढ़ाई कर दी जिसमें औरंगजेब ने साथ लिया कुमाऊँ के राजा "बाज बहादुर चंद" का और सेना लेकर कुमाऊँ के रास्ते ही मात्र डेढ़ दिन में "कैलाश मानसरोवर" लड़ कर वापस छीन लिया...
ये वही औरंगज़ेब है जिसे की कट्टर इस्लामिक बादशाह और "हिन्दूकुश" कहा जाता है, सिर्फ उसी ने हिम्मत दिखाई और चीन पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी थी..
इतिहास के इस हिस्से की प्रमाणिकता को चेक करना हो तो आज़ादी के वक़्त के UNO के हलफनामे देख सकते हैं जो आज भी संसद में भी सुरक्षित हैं।
और आप ये किताबें भी पड़ सकते हैं..
~हिस्ट्री ऑफ उत्तरांचल. (ओ सी हांडा)
तथा
~द ट्रेजेड़ी ऑफ तिब्बत. (मन मोहन शर्मा)





