यूं तो तकरीबन दुनिया का हर धर्म इस बात की ताईद करता है कि इस सारी कायनात और दुनिया की हर एक जान, हर एक चीज का पैदा करने वाला, और इस दुनिया को लगातार चलाए रखने वाला एक ही ईश्वर है, दुनिया की लगभग तमाम धार्मिक आबादियां इन बातों पर ईमान रखने, और एक ईश्वर को बहुत सम्मान और प्रेम करने के बावजूद आखिरकार क्यों इस्लाम के अनुसार एकेश्वरवादी नहीं ठहरतीं ?
दरअसल, इस्लाम के मुताबिक़, पूजा केवल एक निराकार ईश्वर की की जानी चाहिए जो विश्व की अनेक आबादियां नहीं करती हैं, जी हां , इबादत के लिए एक ईश्वर पर ईमान रखना, उसका भरपूर सम्मान और प्रेम दिल मे रखना ही काफी नहीं, बल्कि इबादत अपनी पूर्णता को तब पहुंचती है, जब कोई व्यक्ति अपनी सारी कामनाओं का पूर्तिकर्ता भी एक ईश्वर को ही मानकर, केवल उससे ही दुआ मांगने लगता है, तभी आप ﷺ ने फरमाया कि सबसे बेहतरीन इबादत दुआ है,
सहीह अल जामी/1133
क्योंकि इबादत के बाकी सारे अंग भी दुआ मांगने से ही पैदा होते हैं, देखिए कैसे
आप दुआ मे उसे पुकारते हैं, जिसे आप ऐसी दैवीय शक्तियों से युक्त मानते हैं, जो आपके सामने न होकर भी आपकी दुआ को सुनने और फिर आपकी मनोकामना पूरी करवाने की शक्ति रखता है, आप जिसे पुकारते हो वो आपकी दुआ जल्द पूरी करा दे इस मकसद से आप उसको ही खुश करने के लिए भी कोशिशें करते हो दुआ से पहले, और फिर जब दुआ पूरी हो जाती है तो फिर जिसको आपने दुआ मे पुकारा होता है आप उसी का शुक्रिया भी अदा करते हैं , और उसको अपना भला बुरा कर सकने की कुव्वत रखने वाला मानकर, आप हमेशा उसका आदर करते हैं, और कभी उसका अपमान नहीं देख सकते !!
किसी को अपनी भलाई बुराई का ज़रिया समझकर उसका बहुत आदर, अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए उसे खुश करने की कोशिशें और मनोकामनापूर्ति के बाद उसका शुक्रगुज़ार होना यही सब तो अस्ल इबादत है, जिसे खुद ब खुद अदा करने का शौक इनसान के दिल मे उठता है.
आप देखिए दुनियाभर के धर्मों मे इबादत के तरीके जुदा जुदा हैं लेकिन सबमे कॉमन फैक्टर यही हैं, कि हर पूजा के आगे या पीछे अपने पूज्य प्रभु से दुआ ज़रूर मांगी जाती है, मनोकामना पूर्ति के लिए पूज्य प्रभु की स्तुति व धन्यवाद भी किए जाते है, और जहाँ किसी दैवीय लाभ की आशा के बगैर और दुआ के बगैर किसी व्यक्तित्व की प्रशंसा और धन्यवाद किए जाएं, वो काम इबादत भी नहीं कहलाते, यानि जहाँ दुआ वहाँ इबादत, और जहाँ दुआ नहीं वहाँ इबादत भी नहीं ॥
इसीलिए कि बन्दा एकेश्वरवादिता पर कायम रहे, कुरान करीम ने बार बार इस बात को स्पष्ट किया है, कि
दुआ मे केवल अल्लाह को पुकारो, अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारना शिर्क है,
72:18-20
केवल अल्लाह ही दुआ सुनने वाला है,
3:38
अल्लाह हर पुकारने वाले की पुकार सुनता है, और उस पुकार का जवाब देता है,
2:186
अल्लाह फरमाता है कि मुझसे दुआ करो मै तुम्हारी दुआ कुबूल करूंगा,
40:60
और कौन है जो अल्लाह की मर्जी के बगैर उससे किसी की सिफारिश कर सके ?? (ऐसा कोई भी नहीं है )
2:255
अफसोस कि दुनिया के अनेकों एकेश्वरवादी धर्मों के लोगों ने एक ईश्वर को अपने से दूर समझ लिया और ये समझ लिया कि ईश्वर उनकी दुआ सुनकर उनकी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता और उन लोगों ने दूसरी शक्तियों को स्वयं दुआ पूरी करने मे सक्षम या ईश्वर से दुआ पूरी कराने मे सक्षम मानकर दुआ मे ईश्वर की बजाय इन शक्तियों को पुकारना शुरू कर दिया, और जब ये लोग दुआ मे ईश्वर के अतिरिक्त दूसरों को पुकारने लगे, तो खुद ब खुद ईश्वर की इबादत करने की आदत खत्म होती चली गई और अनजाने ही ये लोग ईश्वर के अतिरिक्त दूसरों की इबादत करने लगे, अल्लाह ने अहले कुरआन को इन गलतियों से पाक रखने के लिए बड़ी साफतौर पर कुरान मे फरमा दिया कि
"और (याद रखो कि) अगर ख़ुदा की तरफ से तुम्हें कोई बुराई छू भी गई तो फिर उसके सिवा कोई उसका दफा करने वाला नहीं होगा और अगर तुम्हारे साथ भलाई का इरादा करे तो फिर उसके फज़ल व करम का लपेटने वाला भी कोई नहीं वह अपने बन्दों में से जिसको चाहे फायदा पहुँचाएँ और वह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है "
10:107
इतनी ताकीदों के बावजूद हमारे बहुत से मुसलमान भाई भी दुआ करते वक्त इस बात का ध्यान नहीं रखते कि दुआ मांगते वक्त सिर्फ अल्लाह को पुकारें, जबकि इस मामले मे ज़रा सी गफलत आपको कहाँ ले जा सकती है. खुद देख लीजिए !!!
(आप चाहें तो औलिया किराम के वसीले से दुआ मांग सकते हैं, लेकिन जैसा कि बताया कि कुरान के अनुसार, दुआ मे अल्लाह के सिवाय किसी को भी पुकारना शिर्क है, इसलिए औलिया ए किराम या किन्हीं भी बुज़ुर्ग का वसीला सही अल्फाज़ मे लें जैसा तरीका अल्लाह ने दुरुदे इब्राहीमी या इससे मिलती जुलती दूसरी दुआओं में सिखाया है और वसीले से दुआ मांगते वक्त अल्लाह को ही पुकारा जाए कि "ऐ अल्लाह हम पर रहम फरमा जैसा कि तूने फलां बुज़ुर्ग पर फरमाया और हमारी दुआ कुबूल फरमा ले" )
By- Zia imtiyaz

