मुस्लिम और आतंकवाद के विषय मे आजकल समाज मे एक बड़ी असमंजस की स्थिति फैली हुई है, जहाँ जिम्मेदार मुस्लिम वर्ग आतंकियों का कोई भी सम्बन्ध इस्लाम से न होने की दलीलें देता है, वहीं गैर मुस्लिम समाज मे अधिकांश आलोचकों का सारा जोर इसी बात पर होता है कि आतंकवादियों को मुस्लिम माना जाए और आतंकवाद का कारण इस्लाम को ॥
सम्भवत: दोनों ही पक्ष अपने हिसाब से ठीक सोच रहे हैं, इस्लाम विरोधी इसीलिए आतंकियो को मुस्लिम मानने पर जोर देते हैं क्योंकि इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मों की परिपाटी यही है कि व्यक्ति बुरे से बुरा पाप कर डाले पर उसके जन्मजात धर्म को हानि नहीं होती, उदाहरणार्थ एक यहूदी यदि किसी की हत्या कर दे तो वो पापी तो हो जाता है पर रहता यहूदी ही है , ऐसा अन्य धर्मो के बारे मे भी कहा जा सकता है,
तो ऐसा ही नियम ये लोग मुस्लिमो के लिए भी सोचते हैं कि एक मुस्लिम कुछ भी पाप करे उसका इस्लाम नहीं जाता ।
लेकिन इन भाईयों की ये धारणा गलत है, इस्लाम की मान्यतानुसार इस्लाम किसी व्यक्ति की पैतृक विरासत नहीं जो जन्म से लेकर मृत्यु तक अनिवार्य रूप से व्यक्ति के साथ रहे, बल्कि इस्लाम का एक बड़ा स्पष्ट सा नियम है कि जिन कामों को करने और ना करने के अल्लाह ने जो आदेश दिए उन आदेशों का पालन करने वाला मुस्लिम है और उन आदेशों की अवहेलना करने वाला कुफ्र पर है ।
तिरमिज़ी शरीफ़ मे नबी ﷺ की एक हदीस है, आप ﷺ फरमाते हैं कि जब कोई मुस्लिम शख्स व्यभिचार करता है, तो वो मुसलमान नहीं रहता, व्यभिचार वो पाप है जो एक स्त्री पुरूष आपसी सहमति से करते हैं, यानी प्रत्यक्ष तौर पर व्यभिचार के पाप मे कोई पक्ष किसी पर अत्याचार नहीं कर रहा होता, इसके बावजूद क्योंकि अल्लाह ने इस कुकर्म से मुस्लिमों को दूर रहने का आदेश दिया है, तो जो भी शख्स अल्लाह की आज्ञा की अवहेलना करता है, वो इस्लाम से खारिज यानी बहिष्कृत हो जाता है, और तब तक बहिष्कृत रहता है जब तक प्रायश्चित न करे, देखिए अहिंसक (मगर गम्भीर) पाप को करने पर भी व्यक्ति इस्लाम से बाहर निकल जाता है, तो बलात्कार, हत्या, डकैती और आतंकवाद जैसे हिंसक और जघन्य अपराधों को करने वाला व्यक्ति इस्लाम मे कैसे गिना जा सकता है ।
स्वयं आप ﷺ ने अपने अंतिम हज के समय मुसलमानो को सावधान करते हुए फरमाया है "कि मेरे जाने के बाद आपस मे खून खराबा कर के वापस "जाहिलियाह" (मुस्लिम बनने से पहले की स्थिति) मे न लौट जाना"
सही मुस्लिम, 1/124
स्पष्ट है कि कत्लोगारतगरी मे मुलव्विस हो जाने वाले व्यक्ति इस्लाम मे नहीं रह जाते, बल्कि कुफ्र की हालत मे पहुंच जाते हैं
मुस्लिमों के बीच ये व्यक्तव्य प्रसिद्ध है कि शैतान हमेशा मुसलमान के ईमान (को खत्म कर देने) की घात मे रहता है, शैतान के बहकावे मे आकर अपने किसी भी गलत कृत्य से व्यक्ति इस्लाम से बाहर हो सकता है , इसलिए मुस्लिम को कभी अपने ईमान पर घमण्ड नहीं करना चाहिए, और सदा अपने ईमान की सलामती के लिए उसे प्रयासरत रहना चाहिए
सो कोई व्यक्ति तभी मुस्लिम है जब वो सुलह, शांति, नेकी, रहमदिली, इनसाफ और परहित के रास्तों पर चलने वाला हो, इसके विपरीत आचरण यानी दूसरों को कष्ट देना, धोखाधड़ी, बेईमानी, हत्या, आतंकवाद आदि मे संलिप्त व्यक्ति चाहे लाख दावे करे कि वो मुसलमान है, अल्लाह और रसूल ﷺ ने स्पष्टत: इन्हें इस्लाम से बहिष्कृत कहा है, और नेक मुस्लिमों का भी कर्तव्य है कि ऐसे दुष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को इस्लाम से खारिज मानें, एवं उनसे दूरी बनाएं, रहे इस्लाम के विरोधी, तो उनका तो काम ही येन केन प्रकारेण इस्लाम मे बुराइयां निकालना है वे नहीं मानेंगे ॥
By- Zia imtiyaz

