पेरिस आतंकी हमले के बाद मैंने फेसबुक पर जगह जगह ऐसी पोस्ट्स देखीं जिनमें कहा गया था कि धार्मिक कट्टरता ही इंसानों को आतंकवाद और खून खराबा सिखाती है, और सारे फसाद की जड़ ये धर्म ही हैं, जब तक लोग अपने धर्म को सबसे महान, और दूसरों के धर्मों को अपवित्र मानते रहेंगे, दुनिया से आतंकवाद और खून खराबा मिट नहीं सकता, ये खून खराबा तो तभी मिटेगा जब हर व्यक्ति धर्म से ज्यादा इंसानियत को महत्व देने लगेगा ॥
हालांकि इन पोस्ट्स को अधिकतर लोगों ने इस्लाम और मुस्लिमों को ध्यान मे रखकर लिखा और पढ़ा, मुसलमानों पर तब्सिरे भी किए, लेकिन जहाँ तक मैं जानता हूँ , दुनिया मे कोई भी धार्मिक समुदाय अपने को महान और दूसरे धर्मों को नीच समझने की प्रवृत्ति से बचा हुआ नहीं है, और इसी प्रवृत्ति के चलते सबने खून खराबे भी खूब कर रखे हैं, इसीलिए उन पोस्ट्स की कई बातों से मैं सहमति रखता हूँ, लेकिन खून खराबे की वजह को सटीक शब्दों मे कहा जाए तो वो धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि "धर्म से अंधा प्रेम" है, यानी धर्म को जाने बगैर सिर्फ धर्म के लिए मरने मारने तक को प्रस्तुत रहना, ये भावना वाकई बेहद खतरनाक है, हम अपने देश मे ही देख लें, जितने भी धार्मिक दंगे यहाँ हुए उनके पीछे धर्मपरायण लोग नहीं थे बल्कि ऐसी खूखार भीड़ थी जिसके दिमाग़ मे धर्म से प्रेम के नाम पर विधर्मियों से बेतहाशा नफरत और उनकी हत्या कर डालने की भावना भर दी गई थी, ये सब देखकर वाकई मे मानना ही पड़ेगा कि धर्म से ऐसा अंधा खूनी प्रेम निहायत खतरनाक है, और किसी धर्म का अनुयायी हो ऐसा आदमी न तो धर्म के लिए स्वीकार्य माना जा सकता है न देश के लिए ॥
मैंने अपनी ज़िन्दगी मे यही तजुर्बा और यही तालीम पाई है कि धर्म इंसानियत से अलग कोई चीज हो ही नहीं सकती, दूसरे शब्दों मे, वो चीज धर्म हो ही नहीं सकती जो किसी इंसान को इंसानियत से बेगाना कर दे ॥ लिहाज़ा ये बात देश और दुनिया के हर धार्मिक समुदाय को समझनी चाहिए और धर्म के नाम पर मारकाट के पाप से तौबा करनी चाहिए ॥
पोस्ट्स मे कहा गया कि लोगों को धर्म से पहले इंसानियत को रखना चाहिए, बेशक, मेरा भी यही कहना है कि हर व्यक्ति को धर्म से पहले इंसानियत को रखना चाहिए, और इंसानियत के तकाज़ों का ख्याल रखते हुए ही अपने धर्म की बातों को मानना चाहिए, मैंने जब खुद अपने ऊपर गौर किया तो पाया कि मैंने खुद अपने धर्म को इसी तरह समझा कि मैंने हमेशा इंसानियत को आगे रखा, फिर जब मैंने ये सुना कि इस्लाम फितरत का दीन है, "फितरत" यानि इंसान का वो प्राकृतिक गुण जो व्यक्ति के मन में भलाई के प्रति आकर्षण, और बुराई के प्रति नापसन्दगी की भावना पैदा करता है ॥
इसी फितरत को ही हम इंसानियत, मानवता या ह्यूमैनिटी के नाम से जानते हैं, जिसका तकाज़ा भलाई की बातों, जैसे दया, प्रेम, न्याय और शांति को पसंद करना और झूठ, धोखाधड़ी, हिंसा जैसी बुराइयों को नापसन्द करना है, तो इन्हीं फितरत/इंसानियत के गुणों को जब इस्लाम धर्म बताया गया तो फिर इस बात को अपने दिमाग़ मे बिठाकर मेरे लिए दीन को समझना बहुत आसान हो गया कि हर वो बात जो इंसानियत के तकाज़े पर खरी उतरे सिर्फ वो ही मेरा धर्म है , और ऐसी बातें जो इंसानी फितरत को नापसन्दीदा हैं, उन बातों को धर्म का नाम देनेवाला शख्स झूठा है, चाहे वो मुस्लिम हो या गैरमुस्लिम ॥
इसके आगे की जिम्मेदारी खुद किसी भी धर्म की होगी कि वो बन्दे मे अपने लिए लगाव पैदा करे, या अलगाव पैदा कर दे, इस्लाम में कोई विरोधाभास पाए जाने पर शायद मेरा यकीन उसपर मज़बूत न हो पाता लेकिन मैंने कभी कभार व्याख्याकारों को तो गलत पाया लेकिन कुरान या सही हदीस की शिक्षाओं को कभी इंसानियत के विरुद्ध नहीं पाया, इस वजह से तमाम अच्छी बातें सिखाने वाले धर्म इस्लाम से मुझे मोहब्बत भी हो गई और इस्लाम पर मेरा यकीन भी मज़बूत हुआ .
वैसे मुझे फितरत पर रखने और धर्म की सही समझ बनाने लायक बनाने मे मेरे वालिदैन का भी अहम रोल है मेरे मां बाप ने मुझे न धर्म पर अंधा यकीन करना सिखाया, न दूसरे धर्म वालों से नफरत, अलबत्ता अपने धर्म की जितनी भी अच्छी अच्छी बातें वो जानते थे वो सब बातें उन्होंने मुझे सिखाईं, मैं समझता हूँ यही अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने का सबसे अच्छा तरीका है, और ऐसे ही हर मां बाप, हर धर्मगुरू को बच्चों को सिर्फ नेकी और भलाई की बातें सिखानी चाहिए, न कि नफरत ॥
मैंने ये भी जाना कि इस्लाम मे बिना मज़हब को जाने उससे अंधा प्रेम करने और उसके लिए मरने मारने की बात सोचने के लिए कोई जगह नहीं है, बल्कि कुरान बार बार अपने पढ़ने सुनने वालों को ताकीद करता है कि अपने बाप दादों के मज़हब को न मानों यानि अपने बड़ों के धार्मिक विश्वासों का अंधानुकरण न करो, बल्कि खुद मज़हब को समझो और फिर मानो, लिहाजा इस्लाम के नाम पर निर्दोष लोगों का खून करने की स्थिति तो कभी बन ही नहीं सकती, सिवाय तब के जब कोई इस्लाम को बदनाम करना चाहे, या इस्लाम की आड़ मे अपनी निजी दुश्मनी निकालना चाहे ॥
By- Zia imtiyaz

