तकदीर के बारे मे ये गलतफहमी कि तकदीर मे अल्लाह इनसान के कुफ्र और ईमान को भी पहले से लिख देता है, रखने वाले मुसलमान कुफ्र को अल्लाह की तरफ से होने का इल्ज़ाम हटाने के लिए ये रटा रटाया जुमला बोल देते हैं कि अल्लाह हमारी तकदीर मे पहले से हमारा भला या बुरा आचरण लिख देता है , क्योंकि हम वैसा ही करने वाले थे और ये बात अल्लाह जानता था इसलिए हमारी तकदीर मे वो लिख दिया .
ये जुमला एक बड़ा सवाल उठाता है कि जब हमारे करने की वजह से अल्लाह ने तकदीर लिखी, न कि अल्लाह के तकदीर लिखने से हमने कुछ किया तो फिर तकदीर पर अल्लाह का इख्तियार नहीं बल्कि इनसान का इख्तियार साबित होगा . जबकि ये ख्याल रखना ईमान की खराबी है .
दूसरा सवाल ये भी पैदा होता है कि अगर इनसान जिन्दगी मे जो काम करता है वो अल्लाह के लिखने न लिखने से नहीं बल्कि इसलिए करता है कि उसे करने ही थे . तो फिर अल्लाह के तकदीर लिखने का मतलब ही क्या ?
जाहिर है हमारे भाई तकदीर का मतलब और तकदीर पर ईमान की वजह को समझ ही नहीं पा रहे हैं, और बात को गलत तरीके से समझाने और समझने की कोशिश कर रहे हैं ॥
आइए कोशिश करते है इसे समझने की
तकदीर पर यकीन, एक मुसलमान के ईमान का अहम हिस्सा है,
तकदीर, जिस लफ्ज़ का रूट है अरबी टर्म "क द र" (प्रभुत्व) जिससे तकदीर का माना अल्लाह का इनसान और जिन्नात के हालात पर कादिर होना, अल्लाह का इनसान के ऊपर अपना मालिकाना हक और इख्तियार रखना ठहरता है .
यानि तकदीर पर ईमान का ताल्लुक, इस बात कि मैं कल क्या कुछ करने वाला हूँ की बजाय इस बात से ज्यादा है . कि अल्लाह मेरे साथ क्या कुछ करने वाला है
यानि मेरे साथ कुछ हुआ है या जो कुछ होगा वो सब कुछ अल्लाह के प्रभुत्व के अन्दर है..॥ यानि अगर अल्लाह मेरे साथ कुछ अच्छा करे तो कोई ऐसी ताकत नहीं जो भलाई को मुझसे दूर कर सके..... और अगर मेरे साथ कुछ बुरा हुआ तो अल्लाह के सिवाय कोई ताकत नही जो उस बुराई को मुझसे दूर कर सके
Surah Al-Anaam (6) , Verse 17
ये है इंसान की जिन्दगी पर अल्लाह का कदीर (प्रभुत्वशाली) होना यानी "तकदीर"... यानी दूसरे शब्दों मे इनसान पर अल्लाह की इस कुदरत (प्रभुता) को तकदीर कहा जाता है.
एक मुस्लिम का विश्वास ये होना चाहिए कि अल्लाह ने इनसान की तकदीर मे वो हर बात लिख रखी है जो पूरी जिन्दगी मे उसके साथ होगी और इसमें से किसी भी बात को इनसान टाल नहीं सकता चाहे अल्लाह के सिवाय जिससे भी मदद मांग ले ... इसलिए अपने साथ भलाई होने और अपने ऊपर से बुराई को टालने के लिए बन्दे को हमेशा अपने रब की तरफ रुजू करना चाहिए ।
जहाँ तक इस तकदीर मे बन्दे के कुफ्र या ईमान को पहले से तय करने की बात है तो जब अल्लाह कुरान पाक मे बारहा बता चुका है कि जो इनसान अपनी मर्जी से बुराई इख्तियार करेगा उसे दोज़ख मिलेगी . और जो नेकी इख्तियार करेगा, उसे जन्नत ... तो फिर साफ जाहिर है कि ईमान बच्चा मां के पेट से तय करवा कर नहीं लाता, ... हां ये बात भी ध्यान रखने की है अल्लाह बन्दे के ईमान पर भी पूरी तरह कुदरत रखता है पर कुछ अलग तरीके से .... कुरान पाक की मुबारक आयात से हमें ये मालूम है कि अल्लाह कुरान पाक मे ये फरमाता है कि वो चाहे तो तमाम लोगों को एक उम्मत यानी ईमान वाला बना दे पर उसने पहले एक बात यानी इनसान का इम्तिहान करना तय कर रखा है इसलिए वो उनको स्वतंत्र इच्छा से काम करने दे रहा है (कयामत तक के लिए )
Al-Quran 5:48
इससे जाहिर है कि अल्लाह बन्दे के ईमान पर भी कादिर है और जब जिससे चाहे ईमान ले या दे सकता है ( जैसे कि अल्लाह अंबिया को तमाम उम्र किरदार की बुराई से पाक, और ईमान वाला बनाए रखता है ), पर आमतौर पर अल्लाह ने सभी इनसानो के लिए आचरण की भलाई या बुराई चुनने की आजादी कयामत तक के लिए दी है और ईमान के बारे मे यही अल्लाह की लिखी हुई तकदीर है हर इनसान के लिए, कि वो जैसा समझेगा अपना चरित्र बनाएगा...॥
By- Zia imtiyaz

