अल्लाह रब्बुल आलमीन अपनी पाक किताब मे फरमाता है कि
"मैने इनसानों और जिन्नों को सिर्फ इसलिए पैदा किया, ताकि वो मेरी इबादत करें ।"
[ अल-कुरआन 51:56]
इस पर गैरमुसलिम भाई लोग सवाल करते हैं कि "अल्लाह ये क्यों चाहता है कि हर बन्दा उसकी इबादत करता रहे ... आखिर अल्लाह को हासिल क्या होता है बन्दे से इबादत करवाने से ?"
पहली बात तो ये कि अल्लाह/ईश्वर जो समस्त वस्तुओं का स्वामी और दाता है उसे मनुष्य न कोई वस्तु दे सकता है न कोई लाभ इसलिए ये सवाल ही गलत है कि बन्दे के इबादत करने से अल्लाह को क्या मिलता है .
अल्लाह खुद इन गैरमुस्लिम भाईयों के इस प्रश्न का उत्तर बड़े स्पष्ट रूप से कुरान की इसी सूरत, सूरह ज़ारियत मे दे देता है कि वो इबादत के रूप मे तुमसे रोज़ी यानि धन दौलत नहीं मांगता न ये चाहता है कि तुम उसे खिलाओ [अल-कुरआन 51:57] इसीलिए अन्य धर्मों की तरह इस्लाम मे अल्लाह को कुछ भेंट चढ़ाने की अवधारणा भी नहीं है, तो स्पष्ट है कि हमारे इबादत करने से अल्लाह को कुछ हासिल नहीं होता
अब सवाल ये पैदा होता है कि इसके बावजूद अल्लाह क्यों चाहता है कि बन्दे उसकी इबादत करें .... और क्यों अल्लाह इबादत करने वाले को अच्छी अच्छी चीजें देने का वायदा करता है ?
ये बात समझने के लिए आप मां का ही उदाहरण लीजिए.... मां का प्रेम अपने बच्चे के लिए प्रकृति के बंधन से ऊंचा है,... प्रकृति तो बच्चे को जन्म देकर दो वर्ष दूध पिलाने भर से चल जाएगी .... लेकिन मां जीवन भर अपने बच्चे से निस्वार्थ प्रेम करती रहती है .... मां के इस निस्वार्थ प्रेम को आप केवल प्रकृति चलाने की बाध्यता कहकर इस निस्वार्थ प्रेम का अपमान ही करोगे.
और यदि आप अपनी मां के निश्छल निस्वार्थ प्रेम को पहचान लो तो ये भी जान जाओगे कि इसी तरह, पर इस से बहुत महान अल्लाह का निस्वार्थ प्रेम अपने बन्दे के लिए है कि बन्दा अल्लाह को कुछ नहीं दे सकता पर अल्लाह उस बन्दे को सब कुछ देता है .
और क्योंकि लोग अल्लाह की इबादत से आशय केवल रोजा नमाज़ को समझते हैं जिनके प्रत्यक्ष लाभ न दिखाई देने के कारण इबादत के आदेश पर सवाल उठाया करते हैं, तो पहले तो ये बता दूँ कि रोज़े, नमाज़, हज आदि के स्वास्थ्य के अनेकानेक लाभ मिलते हैं .
और अल्लाह की इबादत की असल और व्यापक अवधारणा क्या है जिसके लिए अल्लाह ने हमारा निर्माण किया है, वो भी बता दूं आपको ... तमाम इस्लामी विद्वानों ने पवित्र कुरान की आयतों के आधार पर कहा है कि इबादत हर वो सत्कार्य है जो कोई व्यक्ति अल्लाह की रज़ा (समर्थन) पाने के उद्देश्य से करता है, कुरान के निर्देशानुसार
सदा सच्ची बात बोलना; ईमानदारी ; माता पिता की खिदमत करना; रिश्तेदारों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना; अपने परिवार के लोगों और हर व्यक्ति के साथ प्रेम रखना, प्रतिज्ञाओं को पूरा करना; हर अच्छी बात का वरण करना और हर बुराई का त्याग करना; अल्लाह के अवज्ञाकारियों और कपटाचारियों के खिलाफ कोशिश करना; मोहताज लोगों को दान देना, पड़ोसी, अनाथ, गरीब, पथिक, और सारे प्राणियों के साथ उपकार करना ये सारे ही काम अल्लाह की इबादत हैं .
वास्तव मे इन सारे कामों को कर के हम अल्लाह को कुछ नहीं देते फिर भी अगर इन कामों को करने पर अल्लाह हमसे राज़ी होने का वायदा करता है तो ये इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि अल्लाह ही इस जीव जगत का रचयिता है, और वो प्राणिमात्र से प्रेम करता है, ऐसे ईश्वर की शरण लेने पर हम कितने धन्य हो जाएंगे, बताने की जरूरत नहीं है
